चंद्रशेखर तिवारी
उत्तराखंड के पहाड़ों में लोकगीत और लोकनृत्य केवल मनोरंजन के साधन नहीं, बल्कि यहां की सामाजिक-सांस्कृतिक जीवनधारा के अभिन्न अंग रहे हैं। इस समृद्ध लोक परंपरा को जीवंत बनाए रखने में महिला लोक गायिकाओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इनमें कुछ गायिकाओं को संचार माध्यमों के जरिए पहचान मिली, जबकि अनेक गुमनाम साधिकाओं ने बिना किसी प्रसिद्धि की आकांक्षा के अपनी गायन कला से पहाड़ के लोक को समृद्ध किया।
गढ़वाल, कुमाऊं और जौनसार की लोक-संगीत परंपरा को सदियों तक बद्दी (बेड़ा), मिरासी और ढाक्की जैसे समुदायों ने आगे बढ़ाया। गढ़वाल के बेड़ा समुदाय की संगीत परंपरा गंधर्वों से जुड़ी मानी जाती है और वे स्वयं को भगवान शिव का वंशज मानते हैं। इन लोक कलाकारों ने गायन, वादन और नृत्य के साथ-साथ तत्कालीन सामाजिक घटनाओं, देवी-देवताओं की कथाओं और जनजीवन को गीतों में पिरोकर लोक-स्मृति को सुरक्षित रखा। इनके गीतों की मिठास, लय और नृत्य की भावपूर्ण अभिव्यक्ति आज भी लोगों के मन को छूती है।
पहाड़ में महिला लोक गायन की परंपरा भी अत्यंत पुरानी और समृद्ध रही है। कुमाऊं में पिथौरागढ़ की कबूतरी देवी और गढ़वाल में गौरिकोट की सुंदरी दीदी, डांगचौरा की परतिमा देवी, दोणि की बचन देई, टेका की कौशल्या देवी, रुद्रप्रयाग की चकोरी देवी तथा धौलछीना, अल्मोड़ा की आनन्दी देवी जैसी अनेक गायिकाओं ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया। इनके अतिरिक्त असंख्य ऐसी लोक गायिकाएं भी रही हैं, जिनके नाम इतिहास में दर्ज नहीं हो सके, लेकिन जिनका योगदान पहाड़ी लोक संस्कृति की निर्मिति में कम महत्वपूर्ण नहीं था।
कुमाऊं की पुरानी महिला लोक गायिकाओं के अनेक गीत आज भी पुराने ग्रामोफोन रिकॉर्डों और लोक-स्मृतियों में सुरक्षित हैं। वरिष्ठ संस्कृति विशेषज्ञ और साहित्यकार स्व. जुगल किशोर पेटशाली से दो-तीन वर्ष हुई बातचीत में उन्होंने जानकारी दी कि कुछ लोकगीत तो सौ वर्ष से भी अधिक पुराने हैं। मास्टर शेर सिंह, इन्द्रबाई और रामप्यारी का झोड़ा “सुरमाली कौतिक लागो, मार झपैका” कभी अत्यंत लोकप्रिय था। इसी तरह गोपी देवी के “हिट वे चना मला कत्यूरा”, “अल्मोड़े की मोहिनी बुलानी किलै नै”, “सोरे की पिरूली पधानी पाणी पिजा पाणी” और “गांधी रे महात्मा गांधी छुंम” जैसे गीतों ने लोकजीवन में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई। चंपा देवी के “तली बै मोटर ऐगे” और “हाई वे घस्यारी मालू, धुर आये घास काटना” जैसे गीत भी उस दौर की सामाजिक परिस्थितियों और लोकभाषा की जीवंत अभिव्यक्ति हैं।
इन पुरानी गायिकाओं की खनकदार आवाज, विशिष्ट गायन शैली और सहज भावाभिव्यक्ति ने पहाड़ी लोक विरासत को पीढ़ी-दर-पीढ़ी पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने लोकगीतों को केवल गाया नहीं, बल्कि उन्हें अपने समय के सामाजिक अनुभवों से जोड़ा और लोक-संस्कृति की निरंतरता बनाए रखी।
आज भी अनेक महिला लोक गायिकाएं इस परंपरा को आगे बढ़ा रही हैं। उत्तराखंड दूरदर्शन और आकाशवाणी केंद्रों ने हाल के वर्षों में उभरती लोक गायिकाओं को मंच देकर उन्हें नई पहचान दिलाने का महत्वपूर्ण कार्य किया है। आवश्यकता इस बात की है कि पुरानी महिला लोक गायिकाओं, उनके गीतों और उपलब्ध ग्रामोफोन रिकॉर्डों का व्यवस्थित संरक्षण, डिजिटलीकरण और दस्तावेजीकरण किया जाए, ताकि पहाड़ की इस अनमोल मौखिक विरासत को आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित रखा जा सके।
दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र की पहल से कुमाऊँनी लोकसंगीत की दुर्लभ धरोहर का डिजिटलीकरण की दिशा में इसी 6 अगस्त 2026 को एक महत्वपूर्ण पहल करते हुए कुमाऊँनी भाषा के पांच दुर्लभ ग्रामोफोन रिकॉर्ड्स का सफलतापूर्वक डिजिटलीकरण किया। ये रिकॉर्ड्स ब्रिगेडियर राजेंद्र रावत के निजी संग्रह से वरिष्ठ पत्रकार व
ऐतिहासिक संदर्भों के जानकार राजू गुसांईं द्वारा प्राप्त किये गये। इन गीतों की रिकाडिंग संभवतः 1930 के दशक के उत्तरार्ध अथवा 1940 के दशक के प्रारम्भ में मानी गई है। इससे पूर्व दो साल पहले दून पुस्तकालय द्वारा अपने लोक संग्रहालय में रखे कुछ अन्य दुर्लभ गीतों को भी ग्रामोफोन से लेकर डिजिटल किया गया है। यह गीत अब डिजिटल स्वरूप में संरक्षित हो गये हैं। डिजिटल के तकनीकी कार्य में हल्द्वानी निवासी लोकसंगीत शोधकर्ता हिमांशु पाठक के सहयोग लिया गया।
इन रिकॉर्ड्स में मास्टर शेर सिंह, गोपी देवी, चंदा बाई, इंदिरा बाई, राम देई तथा अन्य लोक कलाकारों की दुर्लभ प्रस्तुतियाँ दर्ज हैं। डिजिटलीकरण के बाद दून पुस्तकालय के पास पहाड़ी लोकसंगीत के कुछ दुर्लभ ग्रामोफोन रिकॉर्ड्स का डिजिटल संग्रह उपलब्ध हो गया है। संस्थान द्वारा 1930 से 1970 के बीच गढ़वाल, कुमाऊँ और जौनसार क्षेत्र में जारी लगभग 15 संभावित ग्रामोफोन रिकॉर्ड्स की एक प्रारंभिक सूची भी तैयार की जा रही है, जो इस विषय पर आगे के शोध का आधार बन सकती है।
ग्रामोफोन रिकॉड्स के दुर्लभ गीतों के डिजिटल व संरक्षण कार्य की पहल से कई नई ऐतिहासिक जानकारियाँ सामने आई हैं। मास्टर शेर सिंह के तीन ग्रामोफोन रिकॉर्ड्स की जानकारी अब उपलब्ध हो चुकी है और उनके तीन गीत पुस्तकालय के संग्रह में सुरक्षित हैं। महिला कलाकारों में गोपी देवी और चंपा देवी के नाम सर्वाधिक तीन-तीन रिकॉर्ड दर्ज मिले हैं। भीमताल की चंदा बाई तथा राम देई जैसे अपेक्षाकृत अज्ञात लोक कलाकारों के अस्तित्व का भी प्रमाण इन रिकॉर्ड्स से प्राप्त हुआ है। साथ ही यह जानकारी भी सामने आई कि एयरो-फ़ोन कंपनी द्वारा कुछ रिकॉर्ड्स का निर्माण उज्जैन और दिल्ली में भी किया गया था।
उत्तराखंड के सुप्रसिद्ध लोकगायक ग गढ़रत्न नरेंद्र सिंह नेगी की 1992-93 में साक्षरता अभियान के लिए तैयार की गई दुर्लभ ऑडियो कैसेट ‘ज्ञान गंगा’ का भी डिजिटलीकरण किया गया। नौ गीतों वाली यह रिकॉर्डिंग लंबे समय से सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं थी। इसे सामाजिक कार्यकर्ता हरपाल नेगी ने संरक्षित रखा था और दून पुस्तकालय के अनुरोध पर डिजिटलीकरण के लिए उपलब्ध कराया। इस एल्बम में नरेंद्र सिंह नेगी के साथ अनुराधा निराला, मीना राणा, उमा राणा सहित अनेक कलाकारों की प्रस्तुतियाँ शामिल हैं, जबकि गीत भजन सिंह कंडारी, शशि भूषण मैथानी, प्रकाश थपलियाल,कृष्णानंद नौटियाल, हरपाल नेगी, महिपाल स्नेही, पुष्कर कंडारी और सुदर्शन भंडारी सहित कई रचनाकारों ने लिखे थे।
दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र ने लोकसंगीत की इस अमूल्य धरोहर को सुरक्षित रखने तथा भविष्य की पीढ़ियों तक पहुँचाने के उद्देश्य से इन रिकॉर्डिंग्स का स्थायी डिजिटल अभिलेख तैयार करने का प्रयास किया है। साथ ही संस्कृति व इतिहास के जानकार लोगों, लोकगाययकों, संस्कृति प्रेमियों, अनुरोध किया गया है कि वे इन गीतों को अपने सोशल मीडिया माध्यमों से सार्वजनिक कर, ताकि यह सांस्कृतिक विरासत अधिकाधिक लोगों तक पहुँचे और दीर्घकाल तक संरक्षित रह सके।































