भारत सिंह
यूनानी दार्शनिकों सुकरात, प्लेटो और अरस्तू ने लोकतंत्र के संभावित ख़तरों की ओर इशारा करते हुए चेताया था कि प्रतिनिधित्व का संतुलन बिगड़ जाए तो लोकतंत्र को भीड़तंत्र में तब्दील होते देर नहीं लगेगी। ऐसा होने पर लोकतांत्रिक संस्थाओं की वैधता पर भी सवाल खड़े होने लगते हैं। यह संकट परिसीमन बहस के केंद्र में भी है।
हाल ही में लोकसभा में जो तीन बिल पास नहीं हो सके, उनमें एक परिसीमन बिल भी था। परिसीमन भारतीय राजनीति का ऐसा जटिल प्रश्न है जिस पर लंबे समय से शुतुरमुर्गी रवैया अपनाया गया है। आज भी देश में लोकसभा और विधानसभा सीटों की संख्या 1971 की जनगणना पर आधारित है, जबकि निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं 2001 की जनगणना के आधार पर तय की गई हैं। यह विसंगति कई सवाल खड़े करती है।
भारत में परिसीमन का मूल आधार यह रहा है कि ‘हर व्यक्ति के वोट का समान मूल्य हो।’ ऐसे में जनसंख्या को आधार बनाना लोकतांत्रिक समानता की अहम आधारशिला है, लेकिन लोकतंत्र केवल समानता का ही नहीं, बल्कि समुचित प्रतिनिधित्व की भी प्रणाली है। यही कारण है कि प्रतिनिधित्व का सवाल आज़ादी से पहले से ही भारतीय राजनीतिक विमर्श का हिस्सा रहा है, जिसका उदाहरण 1932 का पूना समझौता है।
आज़ादी के दौरान नीति-निर्माताओं के सामने देश को एकजुट रखने की चुनौती आज के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा बड़ी थी। ऐसे में परिसीमन को केवल आबादी आधारित रखना व्यवहारिक समाधान माना गया, जिससे क्षेत्रीय असंतोष को सीमित रखा जा सके। लेकिन आज हालात अलग हैं। आज परिसीमन के सवाल पर सबसे पहले क्षेत्रीय असंतुलन का मुद्दा सामने आता है।
परिसीमन की प्रक्रिया 50 साल पहले रोक दी गई थी, क्योंकि यह स्पष्ट हो गया था कि केवल जनसंख्या आधारित मॉडल उन राज्यों को दंडित कर रहा है जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण किया है। इसके बावजूद आज भी वही मॉडल व्यवहार में लागू है। इसे जारी रखा तो जनसंख्या नियंत्रण करने वाले राज्यों की लोकसभा में सीटें कम होंगी और उनकी राजनीतिक आवाज़ कमज़ोर पड़ सकती है।
इसके समाधान के तौर पर एक तर्क यह दिया जा रहा है कि सभी राज्यों की मौज़ूदा लोकसभा सीटों को डेढ़ गुना कर दिया जाए। लेकिन यह यथास्थिति बनाए रखने का सुविधाजनक तरीक़ा है। यह मूलतः ‘रिफ़ॉर्म विदाउट रीडिस्ट्रिब्यूशन’ का उदाहरण है, जो समस्या को टालता है, हल नहीं करता। इससे प्रतिनिधित्व की मौज़ूदा असमानताएं जस की तस बनी रहेंगी और यह भी स्वीकार करना पड़ेगा कि मौज़ूदा प्रक्रिया में कोई ख़ामी नहीं थी।
समानता के अलावा, भारतीय शासन व्यवस्था में सहकारी संघवाद, राज्यों के संतुलित प्रतिनिधित्व और सामाजिक न्याय के प्रश्न भी महत्वपूर्ण हैं। हमारा समाज लिंग, धर्म, जाति, क्षेत्र, संस्कृति जैसे कई आधारों पर विभाजित है। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या प्रतिनिधित्व में इन बिंदुओं को पूरी तरह नज़रअंदाज़ करना उचित होगा या एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाना चाहिए? हालांकि, यह भी ध्यान रखना होगा कि पहचान आधारित प्रतिनिधित्व का ज़्यादा इस्तेमाल राजनीतिक ध्रुवीकरण को बढ़ा सकता है।
पिछले 50 वर्षों में हम ऐसी नीति बनाने की ओर नहीं बढ़ सके जिसमें सभी राज्यों, क्षेत्रों, समुदायों, संस्कृतियों को उचित प्रतिनिधित्व मिल सके। केवल आबादी आधारित परिसीमन ने उत्तर-दक्षिण, उत्तर-पूर्व-उत्तर पश्चिम के बीच असंतुलन की बहस छेड़ दी है। लेकिन इसके अलावा छोटे और दुर्गम भूगोल वाले राज्यों की भी चुनौती है, जिस पर फिलहाल कोई बात नहीं हो रही।
यह ध्यान रखना ज़रूरी है कि भारत में उत्तराखंड, झारखंड, छत्तीसगढ़, तेलंगाना और लद्दाख जैसे नए राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों का निर्माण केवल जनसंख्या के आधार पर नहीं हुआ। इनके पीछे भौगोलिक परिस्थितियां, सांस्कृतिक पहचान, प्रशासनिक आवश्यकताओं के साथ ही विकास के मुद्दे भी शामिल थे। ये उदाहरण बताते हैं कि प्रतिनिधित्व निर्धारण में केवल जनसंख्या अकेला और पर्याप्त आधार नहीं हो सकता।
इसके अलावा शहरीकरण, रोज़गार और क्षेत्रीय पलायन जैसी परिस्थितियों ने इस बहस को और जटिल बनाया है, जिसका हल हम 70 साल पुराने सूत्र से तलाश रहे हैं। एक ओर दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, कोलकाता और बेंगलुरु जैसे महानगरों में सघन जनसंख्या है, वहीं दूसरी ओर पलायन के बाद ख़ाली पड़े गांव और दुर्गम व विरल आबादी वाले इलाक़े भी हैं, जहां बुनियादी सेवाओं तक पहुंच भी आज सबसे बड़ी चुनौती है। दोनों तरह के क्षेत्रों की प्रतिनिधित्व की ज़रूरतें अलग हैं, जिनका हल भी तलाशना होगा।
परिसीमन से जुड़ी एक अन्य अहम समस्या परिसीमन आयोगों के गठन और कार्यप्रणाली में पारदर्शिता की कमी की भी है। आयोग के गठन में केंद्र सरकार की प्रमुख भूमिका होने से हमेशा निष्पक्षता को लेकर संदेह की गुंजाइश बन सकती है। परिसीमन आयोगों की ओर से यह भी स्पष्ट नहीं होता कि सीटों के बंटवारे के लिए किन मानदंडों या मॉडल का उपयोग किया गया है।
ऐसे में ज़रूरी है कि आयोग अपने निर्णयों के आधार, अपनाए गए मानकों और तर्कों को सार्वजनिक करे। इसके अलावा, सीटें बांटने के मानदंडों; जैसे- जनसंख्या में अंतर, भौगोलिक संतुलन और प्रशासनिक इकाइयों की सीमा को भी स्पष्ट किया जाए, ताकि प्रक्रिया अधिक पारदर्शी और विश्वसनीय बन सके।
साथ ही, पूरी प्रक्रिया में शुरुआती स्तर से ही भौगोलिक, सांस्कृतिक, जनजातीय विशेषज्ञों समेत नागरिक समाज की भागीदारी भी सुनिश्चित की जाए। विविधतापूर्ण प्रतिनिधित्व से देश की एकता और अखंडता कमज़ोर नहीं होगी। बल्कि, यही हमें सही अर्थों में समावेशी लोकतंत्र बनाएगा।
इस संदर्भ में एक संभावित रास्ता यह हो सकता है कि परिसीमन के लिए एक मिश्रित मॉडल अपनाया जाए, जिसमें जनसंख्या के साथ-साथ भौगोलिक परिस्थितियों, प्रशासनिक आवश्यकताओं और क्षेत्रीय संतुलन को भी महत्व दिया जाए। साथ ही, छोटे और दुर्गम क्षेत्रों के लिए न्यूनतम प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के उपायों पर भी विचार किया जा सकता है।
अंततः, परिसीमन का प्रश्न केवल सीटों के बंटवारे का तकनीकी मुद्दा नहीं है, बल्कि यह भारतीय लोकतंत्र की दिशा और स्वरूप से जुड़ा हुआ है। इसलिए ज़रूरी है कि समानता, समुचित प्रतिनिधित्व और संघीय संतुलन के बीच विवेकपूर्ण और पारदर्शी संतुलन स्थापित किया जाए। यही संतुलन भारत की लोकतांत्रिक एकता को सुदृढ़ करने का आधार बन सकता है।
वैसे भी राष्ट्र मज़बूत शासन, स्पष्ट सीमाओं, राजनीतिक जोड़-तोड़ और नफ़ा-नुकसान के दांव-पेंच से नहीं भरोसे से बनता है। आयरिश राजनीति विज्ञानी बेनडिक्ट एंडरसन ने कहा है कि किसी राष्ट्र को एकजुट रखने में सिर्फ एक काल्पनिक साझा अहसास काम आता है कि ‘हम सब एकसाथ हैं और एक जैसे हैं।’ अगर किसी क्षेत्र या समुदाय में अलगाव का भाव गहरा हुआ तो केवल संवैधानिक प्रावधान उसे ठीक नहीं कर सकेंगे। इसलिए परिसीमन की प्रक्रिया को भरोसेमंद और समावेशी बनाना उतना ही ज़रूरी है जितना कि प्रतिनिधित्व का संतुलन।































