नारीमन चौराहे के एक जबरदस्त शख्सियत हैं जनाब इश्हाक राही साहब, जिन्हें लोग शायर, सूफी अदीब, केमू कम्पनी के इंचार्ज, सरकारी स्कूल के टीचर और गुरु जी के रूप में जानते हैं। वो दो किताबों के लेखक हैं जिसमें एक सूफीइज्म के जुज आधार नफ्स की हकीकत बहुत अहम है। दूसरी किताब, तजकिरा-ए-अब्बासिया है। सैकड़ों मुशायरों रेडियो नशिस्त में शिरकत कर चुके राही साहब पुराने सुनहरे दिनों को याद करें हुए कहते हैं कहां चले गए वो शानदार लोग।
राही साहब को बनने गढ़ने और जिंदगी संवरने में उनके स्कूल और शायरी के गुरु पंडित अनिरूद्ध शर्मा का बहुत बड़ा हाथ रहा है, फिर एमबी इंटर कालेज के टीचर्स का। उन्हें उनके दोस्त महेश वशिष्ठ, मोहन सिंह, जाकिर भारती, ने वक्त वक्त पर बहुत मदद की इसके अलावा पी एन शारदा, सरदार भगत सिंह, केमू के सेक्रेटरी देवीदत्त, सरदार हरबंस सिंह, मिर्जा फय्याज बेग, वलीजान खान, मिर्जानी चच्ची, जैसी शख्सियतों ने बहुत सहारा दिया।
नारीमैन चौराहे पिछली से पिछली सदी यानि कि नैनीताल की खोज के बाद से गुलजार होने लगा था, यहां अंग्रेजों के सहयोगी ताजपुर रियासत और रामपुर रियासत से लोग आए और बुलाए गए, 1882 के बाद बरेली से काठगोदाम में रेल आने के बाद बरेली, सैंथल, शाहजहांपुर से लोग आने लगे, आखिरी स्टेशन काठगोदाम होने से काठगोदाम और नारी मैन चैराहे में आबादी बढ़ने लगी। सभी तरफ से सभी धर्मों जातियों के लोग नारीमैन चैराहे में बसे। हिन्दू मुसलमान सिख ईसाई , क्या देसी क्या पहाड़ी अलग अलग बैकग्राउंड से आए और यहां नारी मैन चैराहे के हो कर गए।
1884 में काठगोदाम में रेल आने के बाद रेलवे स्टेशन काठगोदाम को नैनीताल रोड से कनेक्ट करने वाली रोड बनने के बाद यह नारीमैन चैराहा बना। शुरुआती दौर में नारीमैन चौराहे पहाड़ जाने का स्टार्टिंग प्वाइंट बन गया, तब तल्ला काठगोदाम का स्टेशन चैराहा खास नहीं था।
नारीमैन चौराहे से लोग पैदल के अलावा घोड़े से, घोड़ा गाड़ी, बैल गाड़ी, ऊंट गाड़ी, इक्का, टमटम वगैरह से पहाड़ जाते थे। इसलिए नारीमैन चौराहे पर घोड़े वाले इक्के वाले उसके मिस्त्री वगैरह बसे, 1920 के आसपास मोटर ट्रांसपोर्ट शुरू होने के बाद यहां मोटर ट्रांसपोर्ट का काम शुरू हुआ नैनीताल मोटर ट्रांसपोर्ट कम्पनी के बाद केएमओयू बनी, उसका हैड आफिस बना, और नारी मैन बिल्डिंग बनी, यहां पेट्रोल पम्प बना और यहीं से बसों का पहाड़ जाने के लिए रोटेशन बनने लगा जिसे बस का नम्बर लगना कहते थे।
राही साहब के मरहूम दादा पिछली सदी के शुरुआती दिनों ने काठगोदाम में आकर बस गए थे, उन्हीं दिनों इंडियन वेटेरनरी रिसर्च इंस्टीट्यूट मुक्तेश्वर में लोगों की जरूरत हुई तो दादा ने अपने सगे रिश्तेदार बेटे को जिन्हें राही साहब के चाचा कहते थे, वहां भेज दिया, वो आइवीआरआइ में नौकर हो गए, बाद में राही साहब वालिद साहब नगरपालिका में मुलाजिम हो गए। इस तरह राही साहब का बचपना मुक्तेश्वर और काठगोदाम शेरकोट में बीतने लगा। बाद में उन्होंने एमबी इंटर कालेज हल्द्वानी से अपनी स्कूली पढ़ाई की। पढ़ाई के बाद उन्हें सिंचाई विभाग हल्द्वानी में नौकरी लगी लेकिन वालिद ने आबपाशी में होने वाले झगड़ों के मद्देनजर उस नौकरी से मना कर दिया, फारेस्ट की नौकरी भी नहीं की। रोडवेज में नौकरी लगी लेकिन उसे ज्वाइन नहीं की। उस वक्त केएमओ का सिक्का चलता था, उस वक्त वो एशिया की बड़ी ट्रांसपोर्ट कम्पनी हुआ करती थी। एक समय में केमू की बसें चलने का रोटेशन और नम्बर नारीमैन चौराहे पर स्थित केएमओ के हेडक्वार्टर से तय होता था। इसलिए उन्होंने केएमओ में ज्यादा तनख्वाह की वजह से उसके एकाउंट डिपार्टमेंट के क्लर्क के लिए एप्लाई कर दिया। इंटरव्यू में सलैक्ट हो गए। लेकिन एक समस्या आ गई क्लर्क की पोस्ट के लिए 500 रूपए की सिक्योरिटी जमा करनी थी।
राही साहब के वालिद की नगरपालिका की छोटी सी नौकरी थी इतनी बड़ी रकम जमा करना दुश्वार हो रहा था।
नारीमैन चौराहे के एरिए में डा जोशी की पुरानी शैली की पत्थरों से बनी एक खूबसूरत कोठी है, उसमें पीएन शारदा जी किराएदार थे, इन्ही खानदान के वारिसों के पास शहर में बहुत से कारोबार हैं, टेढ़ी पुलिया काठगोदाम का वाकवे माल का भी इसी खानदान का है।
राही साहब के वालिद अब्दुल हमीद जी के पीएन शारदा जी से अच्छे ताल्लुकात थे, वो एक दिन शारदा जी के घर गए, तो उनको फिक्रमंद देखकर शारदा जी ने उनसे वजह पूछी, पहले तो हमीद साहब ने नहीं बताया लेकिन शारदा जी के इसरार करने पर बताया कि बेटे को केएमओ कम्पनी में क्लर्क की नौकरी मिल गई है, लेकिन 500 रुपए की नकद सिक्योरिटी जमानत जमा करनी है, इसकी वजह से नौकरी रूकी हुई है, पीएन शारदा जी ने कहा, तो यह बात है,…. वो फौरन अन्दर कमरे में गए और 500 रूपए लाकर हमीद साहब के हाथों में रख दिए।
60-65 साल पुरानी इस बात को याद करते हुए राही साहब की आंखें भीग जाती हैं, ….और कहते हैं…..कि उस दौर में कैसे शानदार लोग हुआ करते थे, बेलौस होकर मदद कर दिया करते थे।
राही साहब केमू में नौकर हो गए उन्हें कम्पनी में अहम जिम्मेदारी दी गई। उस वक्त टनकपुर के पास लगने वाला महत्वपूर्ण पूर्णागिरी मेला रोहेलखंड तक के लोगों के लिए श्रृद्धा का केंद्र बन गया था। टनकपुर पूर्णागिरी जाने का स्टेशन था। केमू की बसें टनकपुर से पूर्णागिरी के इंट्री प्वाइंट ठूलीगाड़ तक चला करतीं थीं।
मेले में ट्रांसपोर्ट की पूरी व्यवस्था केएमओयू के जिम्मे होती थी। केमो के मैनेजमेंट ने पहली बार इश्हाक राही साहब को मेले के जिम्मेदारी देकर टनकपुर भेजा, जिसका काम उन्होंने जिम्मेदारी से संभाल लिया, तो उन्हें हर साल मेले की ट्रांसपोर्ट व्यवस्था के लिए भेजा जाने लगा। इश्हाक राही साहब 15 साल तक मेला ट्रांसपोर्ट व्यवस्था संभालते रहे।
बाद में राही साहब के साथ एक मैनेजमेंट इश्यू हो गया तो उन्होंने 15 साल की नौकरी के बाद कम्पनी से इस्तीफा दे दिया।
उन्हीं दिनों उनके दोस्त महेश वशिष्ठ जी जो एमबी इंटर कालेज से साथ साथ पढ़े थे और जो हल्द्वानी में राम मंदिर के पुजारी महंत के छोटे भाई थे, नगरपालिका हाईस्कूल काठगोदाम में टीचर बन गए थे (वशिष्ठ जी लेखक के प्रिय टीचर रहे थे बाद में वो काशीपुर के एक इंटर कालेज के प्रिंसिपल हो गए उनकी बीमारी की छुट्टी की स्वीकृति को लेकर एक बड़े शिक्षा अधिकारी से मेरा विवाद भी हुआ था, इस पर फिर कभी लिखूंगा) वशिष्ठ जी को पता चला कि शिक्षा विभाग में उर्दू टीचर की पोस्ट निकली हैं, तो उन्होंने राही साहब की एप्लिकेशन भिजवा दी। शिक्षा विभाग ने टीचर सिलैक्शन के जो कमेटी बनाई उसमें नैनीताल के लोकप्रिय टीचर और शायर जाकिर भारती चेयरमैन थे। जो राही साहब के अच्छे दोस्त थे।
जाकिर भारती साहब लम्बे वक्त तक नैनीताल के सांस्कृतिक कार्यक्रमों के संयोजक रहे थे। शिक्षा विभाग ने टीचर इंटरव्यू के लिए जो दो काल लैटर राही साहब को भेजे थे वो उन्हें मिले ही नहीं, इस बीच नैनीताल में आल इंडिया मुशायरा होने वाला था, राही साहब को मुशायरे का दावतनामा देने के लिए मुशायरे के संयोजक जाकिर भारती ने काठगोदाम पोस्ट आफिस के पोस्टमास्टर हकीमुद्दीन साहब को फोन किया, कि मेरी राही साहब से बात करा दीजिए। पोस्ट मास्टर साहब राही साहब को जानते थे, इस तरह टेलीफोन से मिले दावतनामे के बाद राही साहब मुशायरे के लिए नैनीताल पहुंच गए।
मुशायरे की अगली सुबह जाकिर भारती जी ने उन्हें टीचर की पोस्ट के इंटरव्यू के बारे बताकर पूछा, कि वो इंटरव्यू में क्यों नहीं आए ? तो राही साहब ने कहा उन्हें कोई काल लैटर नहीं मिला।
तब इस सिलसिले में वो शिक्षा विभाग नैनीताल पहुंचे तो वहां उन्हें बड़े बाबू बहुगुणा जी ने फौरन पहचान लिया कि क्योंकि इश्हाक राही साहब पूर्णागिरी मेले के इंचार्ज रहे थे।
हुआ यूं था कि एक बार बहुगुणा जी अपनी बूढ़ी मां और परिवार सहित पूर्णागिरी में दर्शन करने गए थे वहां मेले में बहुत भीड़ की वजह से उन्हें टनकपुर से ठूलीगाढ़ तक बस से जाने के टिकट नहीं मिले, वो लगातार एक हफ्ते से कोशिश कर रहे थे, मगर भीड़ की वजह से टिकट मिल ही नहीं रहे थे। उधर उनकी माताजी की तबियत खराब हो गई। किसी परिचित के संदर्भ से बहुगुणा जी इश्हाक राही साहब से मिले और अपनी परेशानी बताई…..राही साहब ने उनके टिकट का इंतेजाम कर दिया था जिसकी वजह से बहुगुणा जी ने पूर्णागिरी माता के दर्शन कर लिए जिसके लिए राही साहब को शुक्रिया कहा था।
आफिस में राही साहब को देखकर बहुगुणा जी ने फौरन पहचान लिया उन्होंने राही राही साहब को बीएसए से मिलाया, इश्हाक राही साहब को दो प्राइमरी स्कूलों का आप्शन दिए, दुर्गापुर और टनकपुर का, दुर्गापुर के बारे में उन्हें कोई बताने वाला नहीं था कि दुर्गापुर नैनीताल वाला है। तो इश्हाक राही साहब ने टनकपुर का आप्शन चुन लिया क्योंकि वो पूर्णागिरी मेले में केमू के ट्रांसपोर्ट इंचार्ज थे। और टनकपुर से उनको सहूलियत लगी।
एप्वाइंटमेंट लैटर लेकर उन्होंने सीधे टनकपुर के स्कूल में ज्वाइनिंग दे दी, प्राइमरी स्कूल सड़क के किनारे था। क्लास की व्यवस्था ठीक नहीं थी बच्चे सड़क किनारे बैठे थे, वो पढ़ाने बैठे ही थे कि उनके एक पूर्व परिचित उनको पहचानने की कोशिश करते हुए और अजीब तरह से देखते हुए गुजरे तो इशघ््हाक राही साहब को बड़ी शर्म लगी।
जिस शहर में उन्होंने साहबी की नौकरी की हो, पूर्णागिरी का मेले की अहम जिम्मेदारी संभाली हो, जिसकी वजह से उनके परिचय का बड़ा दायरा हो गया हो, वहां उन्हें नौकरी की ऐसी जगह अखर गई। उन्होंने वहां से किसी तरह रिलीव लैटर लिया और फिर बीएस आफिस पहुंच गए। इस बार किस्मत ने साथ दिया और उन्हें रेलवे के कर्मचारियों के लिए खुले सरकारी प्राइमरी स्कूल काठगोदाम में एप्वाइंटमेंट मिल गया।
इश्हाक राही साहब ने इस स्कूल में 25 साल रेलवे के कर्मचारियों के बच्चों को बड़े मन से पढ़ाया आज उनके पढाए हुए बच्चे ऊंची-ऊंची पोस्ट पर है और अक्सर कोई न कोई बच्चा अपने गुरु जी से मिलने इसी जाते है। राही साहब आजतक अपने टीचर बनने और सरकारी सेवा लगने के वाकये के लिए जाकिर भारती जी, नगरपालिका हाई स्कूल के टीचर महेश वशिष्ठ (जिनके समकालीन और दोस्त सीआरएसटी स्कूल नैनीताल को टीचर केपी साह जी है, जो पहले काठगोदाम हाईस्कूल में पढ़ाते थे।) बीएसए शाह जी और आफिस के बाबू बहुगुणा के एहसान मंद हैं।
अस्सी के दशक की बात है राही साहब के एक दोस्त मोहन सिंह थे जो उस वक्त के मशहूर संन्यासी नानतिन बाबा के शिष्य थे वो अक्सर नानतिन बाबा के चमत्कारों के बारे में बताया करते थे, राही साहब खुद सूफियों की सोहबत में रहते थे, सूफियों की दरगाहों की हाजिरी देते रहते थे, वहां की उर्स की महफिलों में जाया करते थे, और मीलाद शरीफ पढ़ते थे। उन्होंने अपने दोस्त मोहन सिंह से नानतिन महाराज के दर्शन करने की इच्छा बताई, लेकिन लम्बा वक्त बीत गया मुलाकात नहीं हुई।
उस बीच नानतिन महाराज काठगोदाम के बलवंत मोटर वालों के यहां आए, राही साहब को पता तो वो दर्शन के वहां गए भी, लेकिन तब तक नानतिन महाराज वहां से चले गए। एक दिन राही साहब केमू दफ्तर के बरामदे में आ रही धूप में कुर्सी लगाकर काम कर रहे थे कि पश्चिम की तरफ के भदयूनी गांव से एक महात्मा आते दिखाई दिये, उनके साथ काफी लोग थे। महात्मा जी सड़क पार करके केमू दफ्तर के नीचे नारीमैन बिल्डिंग से लगी हुई पुरानी दीवार पर बैठ गए, यह दीवार बिल्डिंग से लगी हुई उस जगह पर बनी थी। जहां एक वक्त में नारी मैन कम्पनी का पेट्रोल पंप चला करता था। राही साहब कुछ समझ पाते तब तक मुहल्ले के बुजुर्ग वलीजान खान ने लाला प्यारे लाल जी की दूकान के आगे खड़े फल वाले से केले खरीद कर सड़क पार करली, तब राही साहब की समझ में आया कि हो न हो यही नानतिन महाराज हैं।राही साहब फौरन दफ्तर से नीचे उतरे और महाराज के पास पहुंचे, लोगों की भीड़ लगी हुई थी, तब तक महाराज वलीजान खान के भेंट किए केले बीच से दो हिस्से करके मुस्कुराते हुए भक्तों में बांट रहे थे, कुछ बोले और फिर गौलापार के लिए निकल गए, नारीमैन चैराहे पर नानतिन महाराज का आना और नारीमैन चैराहे पर बैठकर भक्तों को प्रसाद बांटना लोगों को सालों तक याद रहा।
राही साहब आल इंडिया स्तर के मुशायरों में जाते रहे हैं, एक बार राही साहब की वजह से इन पंक्तियों के लेखक की एक जानने वाले युवा कवि से झगड़े की नौबत आ गई। अस्सी और नब्बे के दशक में हल्द्वानी में जाड़ों के मौसम में और नैनीताल में शरदोत्सव में आल इंडिया मुशायरे और कवि सम्मेलन होते रहते थे, जिनमें देश के चोटी के कवि और शायर हिस्सा लेते थे। कभी कभी मुशायरा कवि सम्मेलन मिला जुला भी होता था। लेकिन इसके अलावा कवि गोष्ठियां और नशिश्त भी खूब होती थी। जिनमें लोकल कवि और शायर भाग लेते थे। इन कार्यक्रमों का एक फायदा यह होता था कि लोकल शायरों और कवियों को अपना कलाम सुनाने का मौका मिल जाया करता था। उन दिनों मैं अमर उजाला के लिए काम करता था, ऐसे ही एक कार्यक्रम की रिपोर्टिंग में मैंने राही साहब के लिए लिखदिया कि राही शेरकोटी साहब आल इंडिया मुशायरों में हिस्सा ले रहे हैं। एक लोकल कवि महोदय जो लोकल ही थे और लोकल ही रहे, और उनकी प्रशंसा में मैंने अखिल भारतीय स्तर का कवि न लिखकर यह लिख दिया कि कवि जी जिले और आसपास खूब लोकप्रिय हैं। इस बात का इतना बतंगड़ बना कि झगड़े करने पर उतारू हो गए बाद में उन्होंने मुझसे कई साल तक दुश्मनी रखी।































