महेश पंत
भारत अबकी बार फिर उस सवाल के सामने खड़ा है जिसे वह दशकों से स्थगित करता आया है। संसदीय परिसीमन अब अनिवार्य रूप से राष्ट्रीय एजेंडे पर लौट रहा है। इसके साथ ही एक सहज-सी लगने वाली धारणा फिर जोर पकड़ रही है कि क्या लोकसभा में अधिक सांसद होने से प्रतिनिधित्व बेहतर हो जाएगा। क्या यह सच है ?
पहली दृष्टि में यह तर्क स्वाभाविक लगता है। कम मतदाताओं वाला निर्वाचन क्षेत्र, अधिक सुलभ जनप्रतिनिधि, और नागरिक के लिए अपेक्षाकृत आसान पहुँच, यह सब सुनने में लोकतांत्रिक गहराई का संकेत भी देता है। लोग कुछ कम जनसंख्या वाले देशों से आँकड़ों की तुलना भी करने लग जाते हैं। लेकिन लोकतंत्र का गणित और उसका अनुभव, दो अलग चीजें हैं।
गणित का आकर्षण, वास्तविकता की सीमा
आज लोकसभा में 543 निर्वाचित सदस्य हैं। 2024 की लोकसभा की मतदाता सूची के हिसाब से सबसे छोटा संसदीय क्षेत्र लक्षद्वीप (57,953 मतदाता) और सबसे बढा मल्काजगिरि (37,80,453 मतदाता) वाले हैं। ऐसे विशेष क्षेत्रौं को छोड दें तो सामान्य क्षेत्रौं में मतदाताओं की संख्या 15 से 25 लाख होती है। परिसीमन के बाद यदि यह संख्या बढ़कर 800 या उससे अधिक होती है, तो प्रति सांसद प्रतिनिधित्व घटकर लगभग 10.16 लाख रह जाएगा। यह एक महत्वपूर्ण सांख्यिकीय परिवर्तन है। परंतु प्रश्न यह है कि क्या इससे नागरिक और प्रतिनिधि के बीच संबंध गुणात्मक रूप से बदल जाएगा? या यू कहें कि क्या यह नागरिक के लिये परिवर्तन महसूस करने लायक भी होगा ?
आज लोकसभा में 543 निर्वाचित सदस्य हैं। 2024 की लोकसभा की मतदाता सूची के हिसाब से सबसे छोटा संसदीय क्षेत्र लक्षद्वीप (57,953 मतदाता) और सबसे बढा मल्काजगिरि (37,80,453 मतदाता) वाले हैं। ऐसे विशेष क्षेत्रौं को छोड दें तो सामान्य क्षेत्रौं में मतदाताओं की संख्या 15 से 25 लाख होती है। परिसीमन के बाद यदि यह संख्या बढ़कर 800 या उससे अधिक होती है, तो प्रति सांसद प्रतिनिधित्व घटकर लगभग 10.16 लाख रह जाएगा। यह एक महत्वपूर्ण सांख्यिकीय परिवर्तन है। परंतु प्रश्न यह है कि क्या इससे नागरिक और प्रतिनिधि के बीच संबंध गुणात्मक रूप से बदल जाएगा? या यू कहें कि क्या यह नागरिक के लिये परिवर्तन महसूस करने लायक भी होगा ?
व्यावहारिक रूप से, एक नागरिक के लिए अपने सांसद से नीति-स्तर पर संवाद की संभावना आज भी अत्यंत सीमित है। यदि इसे संख्यात्मक रूप में देखें, तो किसी एक मतदाता का प्रभाव 0.0000004 से बढ़कर 0.000001 हो सकता है, एक वृद्धि, जो गणितज्ञों को तो दिखेगी, पर लोकतांत्रिक अनुभव में लगभग अदृश्य ही रहेगी। इसलिए, केवल संख्या बढ़ाने से प्रतिनिधित्व का सार नहीं बदलता।
भौगोलिक तक: आंशिक सत्य
यह तर्क दिया जाता है कि छोटे निर्वाचन क्षेत्र भौगोलिक दृष्टि से अधिक प्रबंधनीय होते हैं। इसमें कुछ सच्चाई अवश्य है, विशेषकर लद्दाख जैसे दुर्गम क्षेत्रों में, जो 2024 लोकसभा चुनाव का सबसे बढ़ा क्षेत्र था। यदि ऐसे क्षेत्र छोटे हों तो निश्चित रूप से सुगमता बढ़ेगी। परंतु आज के डिजिटल और संचार-प्रधान युग में भौतिक दूरी का महत्व पहले जैसा नहीं रह गया है। मोबाइल, इंटरनेट और सोशल मीडिया ने नागरिक और प्रतिनिधि के बीच संपर्क के नए रास्ते खोल दिए हैं। अतः भौगोलिक सुगमता का तर्क अब सीमित महत्व रखता है, न कि निर्णायक।
यह तर्क दिया जाता है कि छोटे निर्वाचन क्षेत्र भौगोलिक दृष्टि से अधिक प्रबंधनीय होते हैं। इसमें कुछ सच्चाई अवश्य है, विशेषकर लद्दाख जैसे दुर्गम क्षेत्रों में, जो 2024 लोकसभा चुनाव का सबसे बढ़ा क्षेत्र था। यदि ऐसे क्षेत्र छोटे हों तो निश्चित रूप से सुगमता बढ़ेगी। परंतु आज के डिजिटल और संचार-प्रधान युग में भौतिक दूरी का महत्व पहले जैसा नहीं रह गया है। मोबाइल, इंटरनेट और सोशल मीडिया ने नागरिक और प्रतिनिधि के बीच संपर्क के नए रास्ते खोल दिए हैं। अतः भौगोलिक सुगमता का तर्क अब सीमित महत्व रखता है, न कि निर्णायक।
भारतीय लोकतंत्र की केंद्रीय सच्चाई: पार्टी-प्रधान व्यवस्था
इस पूरी बहस का सबसे महत्वपूर्ण, पर अक्सर अचर्चित पहलू यह है कि भारत का लोकतंत्र व्यवहार में सांसद-प्रधान नहीं, बल्कि पार्टी-प्रधान है। मतदाता अधिकांशतः उम्मीदवारों के बीच नहीं, बल्कि पार्टियों और गठबंधनों के बीच चुनाव करते हैं। नीतियाँ, विधेयक, और संसदीय रुख, ये सब राजनीतिक दलों द्वारा निर्धारित किये जाते हैं। सांसद, अधिकांश मामलों में, पार्टी लाईन के अनुसार ही मतदान करते हैं। अन्यथा पार्टी व्हिप भी तो है! इस व्यवस्था में, व्यक्तिगत सांसद की भूमिका सीमित रह जाती है, विशेषकर नीति-निर्माण और विधायी कार्य के स्तर पर। ऐसे में, यह मान लेना कि सांसदों की संख्या बढ़ाने से प्रतिनिधित्व स्वतः सशक्त हो जाएगा, संरचनात्मक वास्तविकताओं की अनदेखी है।
इस पूरी बहस का सबसे महत्वपूर्ण, पर अक्सर अचर्चित पहलू यह है कि भारत का लोकतंत्र व्यवहार में सांसद-प्रधान नहीं, बल्कि पार्टी-प्रधान है। मतदाता अधिकांशतः उम्मीदवारों के बीच नहीं, बल्कि पार्टियों और गठबंधनों के बीच चुनाव करते हैं। नीतियाँ, विधेयक, और संसदीय रुख, ये सब राजनीतिक दलों द्वारा निर्धारित किये जाते हैं। सांसद, अधिकांश मामलों में, पार्टी लाईन के अनुसार ही मतदान करते हैं। अन्यथा पार्टी व्हिप भी तो है! इस व्यवस्था में, व्यक्तिगत सांसद की भूमिका सीमित रह जाती है, विशेषकर नीति-निर्माण और विधायी कार्य के स्तर पर। ऐसे में, यह मान लेना कि सांसदों की संख्या बढ़ाने से प्रतिनिधित्व स्वतः सशक्त हो जाएगा, संरचनात्मक वास्तविकताओं की अनदेखी है।
समाधान ? संख्या नहीं, संरचना बदलें
यदि लक्ष्य वास्तव में लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व को गहरा करना है, तो ध्यान संख्या पर नहीं, बल्कि संस्थागत संरचना पर होना चाहिए। कुछ प्रमुख सुधार इस दिशा में सार्थक हो सकते हैं:
यदि लक्ष्य वास्तव में लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व को गहरा करना है, तो ध्यान संख्या पर नहीं, बल्कि संस्थागत संरचना पर होना चाहिए। कुछ प्रमुख सुधार इस दिशा में सार्थक हो सकते हैं:
1. सांसद की भूमिका का पुनर्परिभाषण
सांसद को स्थानीय समस्याओं के समाधानकर्ता के बजाय राष्ट्रीय नीति-निर्माता के रूप में स्थापित करना होगा। सांसद निधि जैसी योजनाओं की पुनर्समीक्षा इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हो सकती है।2. स्थानीय स्वशासन को वास्तविक अधिकार
भारत का लोकतंत्र तभी गहरा होगा जब उसका आधार मजबूत होगा। ग्राम पंचायतों, नगरपालिकाओं और नगर निगमों को वित्तीय और प्रशासनिक स्वायत्तता देना प्रतिनिधित्व को जमीनी स्तर पर सशक्त करेगा। लोगों की रोजमर्रा की समस्याओं का समाधान स्थानीय संस्थाओं को ही दिया जाय।
सांसद को स्थानीय समस्याओं के समाधानकर्ता के बजाय राष्ट्रीय नीति-निर्माता के रूप में स्थापित करना होगा। सांसद निधि जैसी योजनाओं की पुनर्समीक्षा इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हो सकती है।2. स्थानीय स्वशासन को वास्तविक अधिकार
भारत का लोकतंत्र तभी गहरा होगा जब उसका आधार मजबूत होगा। ग्राम पंचायतों, नगरपालिकाओं और नगर निगमों को वित्तीय और प्रशासनिक स्वायत्तता देना प्रतिनिधित्व को जमीनी स्तर पर सशक्त करेगा। लोगों की रोजमर्रा की समस्याओं का समाधान स्थानीय संस्थाओं को ही दिया जाय।
3. संसदीय समितियों का सशक्तीकरण
वास्तविक, गहन और विशेषज्ञतापूर्ण विमर्श संसद की स्थायी समितियों में होता है। यदि इन्हें अधिक अधिकार, संसाधन और स्वतंत्रता मिले तो नीति-निर्माण की गुणवत्ता स्वतः सुधरेगी। इस स्तर पर योग्य सांसदों को भाग लेने का अवसर मिले और अपनी योग्यता में वृद्धि करने का भी।
वास्तविक, गहन और विशेषज्ञतापूर्ण विमर्श संसद की स्थायी समितियों में होता है। यदि इन्हें अधिक अधिकार, संसाधन और स्वतंत्रता मिले तो नीति-निर्माण की गुणवत्ता स्वतः सुधरेगी। इस स्तर पर योग्य सांसदों को भाग लेने का अवसर मिले और अपनी योग्यता में वृद्धि करने का भी।
4. राजनीतिक दलों के भीतर लोकतंत्र
जब तक उम्मीदवार चयन और नेतृत्व संरचना में पारदर्शिता नहीं होगी, तब तक प्रतिनिधित्व की गुणवत्ता सीमित ही रहेगी। जाति, परिवार, क्षेत्र या भाषा की जगह योग्यता, कार्यकुशलता अनुभव को महत्व देना आवश्यक है। आंतरिक लोकतंत्र भारतीय राजनीति की सबसे बड़ी अनकही आवश्यकता है, जिसका समय अब नहीं टाला जा सकता।
जब तक उम्मीदवार चयन और नेतृत्व संरचना में पारदर्शिता नहीं होगी, तब तक प्रतिनिधित्व की गुणवत्ता सीमित ही रहेगी। जाति, परिवार, क्षेत्र या भाषा की जगह योग्यता, कार्यकुशलता अनुभव को महत्व देना आवश्यक है। आंतरिक लोकतंत्र भारतीय राजनीति की सबसे बड़ी अनकही आवश्यकता है, जिसका समय अब नहीं टाला जा सकता।
5. प्रौद्योगिकी आधारित जन-सहभागिता
डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से नागरिकों को विधायी प्रक्रिया में जोड़ना, जैसे सार्वजनिक परामर्श, ऑनलाइन सुझाव आदि प्रतिनिधित्व को वास्तविक अर्थ दे सकता है। सांसद अपने क्षेत्र में उपक्षेत्र आधारित या विषय आधारित कमेटियों का गठन कर जनसहभागिता बढ़ा सकते हैं। सांसद पार्टी में अपने प्रभाव का विस्तार भी इस माध्यम से कर सकते हैं।
डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से नागरिकों को विधायी प्रक्रिया में जोड़ना, जैसे सार्वजनिक परामर्श, ऑनलाइन सुझाव आदि प्रतिनिधित्व को वास्तविक अर्थ दे सकता है। सांसद अपने क्षेत्र में उपक्षेत्र आधारित या विषय आधारित कमेटियों का गठन कर जनसहभागिता बढ़ा सकते हैं। सांसद पार्टी में अपने प्रभाव का विस्तार भी इस माध्यम से कर सकते हैं।
प्रतिनिधित्व की गहराई का असली पैमाना
लोकतंत्र केवल इस बात से नहीं मापा जाता कि संसद में कितनी सीटें हैं। हमारे जैसे घनी जनसंख्या वाले देश मे यह सीमा बनी रहेगी। वह इस बात से मापा जाना चाहिये कि क्या नागरिक की आवाज सुनी जाती है ? क्या वह नीति को प्रभावित कर सकता है ? और क्या उसे शासन में भागीदारी का, छोटा ही सही, वास्तविक अवसर मिलता है ?
लोकतंत्र केवल इस बात से नहीं मापा जाता कि संसद में कितनी सीटें हैं। हमारे जैसे घनी जनसंख्या वाले देश मे यह सीमा बनी रहेगी। वह इस बात से मापा जाना चाहिये कि क्या नागरिक की आवाज सुनी जाती है ? क्या वह नीति को प्रभावित कर सकता है ? और क्या उसे शासन में भागीदारी का, छोटा ही सही, वास्तविक अवसर मिलता है ?
सांसदों की संख्या बढ़ाना एक आसान समाधान है, परंतु शायद सतही भी। वास्तविक चुनौती कठिन है: लोकतंत्र की संरचना को इस प्रकार गढ़ना कि हर नागरिक केवल गिना ही न जाए, बल्कि सुना भी जाए।
“नुमाइंदों की तादाद बढ़ाने से नुमाइंदगी नहीं बढ़ती
जम्हूरियत तब रंग लाती है जब आवाज में असर हो”
जम्हूरियत तब रंग लाती है जब आवाज में असर हो”
परिसीमन की बहस का एक महत्वपूर्ण आयाम, भूगोल, अक्सर उपेक्षित रह जाता है। भारत की लोकतांत्रिक संरचना केवल जनसंख्या पर आधारित नहीं रही है। इसमें भौगोलिक जटिलताओं को भी स्थान मिला है। यह समझ प्रारंभ से रही कि पर्वतीय, वनप्रधान और द्वीपीय क्षेत्रों की चुनौतियाँ समतल और शहरी क्षेत्रों से भिन्न हैं, और इसलिए उनके प्रतिनिधित्व को केवल मतदाताओं की संख्या से नहीं आँका जा सकता। इसी सोच के कारण इन क्षेत्रों को अपेक्षाकृत कम जनसंख्या के बावजूद संसदीय प्रतिनिधित्व दिया गया। लक्षद्वीप की लोकसभा सीट पर मतदाता संख्या मात्र 57,953 है। यह एक प्रशासनिक सुविधा के साथ-साथ लोकतांत्रिक विवेक का परिचायक भी है। एक ऐसा संतुलन जिसमें समानता के साथ न्यायोचितता भी निहित थी।
परंतु पिछले कुछ दशकों में यह संतुलन धीरे-धीरे विचलित हो रहा है। आर्थिक विकास और अवसरों के असमान वितरण ने पहाड़ी क्षेत्रों से निरंतर पलायन को बढ़ा दिया है। युवा और कार्यसक्षम लोग मैदानी और शहरी क्षेत्रों की ओर खिंचते चले गए, जबकि पीछे छूट गए वृद्ध लोग, सीमित संसाधन और कठिन जीवन परिस्थितियाँ। कई गाँव खाली हो गए या आंशिक रूप से निर्जन हो गए हैं। परिणामस्वरूप, पहाड़ के जीवन में कठिनाइयाँ और बढ़ गयी हैं।
इस परिवर्तन ने एक नई विडम्बना को जन्म दिया है। जो क्षेत्र भौगोलिक रूप से अधिक जटिल, पर्यावरणीय रूप से अधिक संवेदनशील और रणनीतिक दृष्टि से अधिक महत्वपूर्ण हैं, वे जनसंख्या के आधार पर राजनीतिक रूप से और अधिक कमजोर होते जा रहे हैं। यदि परिसीमन में जनसंख्या को ही अधिक महत्व दिया गया तो निश्चित रूप से इन क्षेत्रों के प्रतिनिधित्व और कम हो जायेगा।
केवल सीटों की संख्या का प्रश्न नहीं है, बल्कि नीति-निर्माण की गुणवत्ता का भी प्रश्न है। पहाड़ी क्षेत्रों की समस्याएँ विशिष्ट होती हैं। जल स्रोतों की प्रकृति, भूस्खलन और आपदाओं का जोखिम, सीमावर्ती सुरक्षा और दूर-दराज बस्तियों तक प्रशासनिक पहुँच की विरलता, संचार की समस्या, सांस्कृतिक चेतना। इन जटिलताओं को समझने के लिए केवल आँकड़े पर्याप्त नहीं होते। इसके लिए अनुभव और संवेदनशीलता की आवश्यकता होती है।
इस संदर्भ में मुझे मेरे बचपन की वह बात याद आती है, जिसमें अल्मोड़ा की जल समस्या के समाधान के लिये उत्तर प्रदेश सरकार ने कुएँ खोदने का विचार किया था। यह प्रसंग सच हो या न हो, पर इस गहरी समस्या को उजागर करता है कि जब नीति-निर्माण में स्थानीय भूगोल की समझ कम हो जाती है, तो समाधान भी वास्तविकता से कटे हुए हो जाते हैं। हाल ही में मैंने दन्या में हैण्ड पम्प देखे जो सूखे पडे़ थे। मुझे बताया गया कि आसपास के नौले भी सूख गये।
इसके साथ ही संसाधनों का प्रश्न भी उतना ही महत्वपूर्ण है। पहाड़ी क्षेत्रों में जल, भूमि और आजीविका के साधन सीमित और नाजुक होते हैं। वहाँ बुनियादी सेवाओं, स्वास्थ्य, शिक्षा, परिवहन की उपलब्धता अधिक कठिन और महंगी होती है। इसके विपरीत, नीति-निर्माण में अक्सर वही मानक अपनाए जाते हैं, जो समतल या शहरी क्षेत्रों के लिए उपयुक्त मानकों से सतही तौर पर ही भिन्न होते हैं। प्रति व्यक्ति आय, अवसंरचना घनत्व या सेवा-प्रदाय की लागत जैसे सूचकांक पहाड़ों की वास्तविकताओं को सही ढंग से प्रतिबिंबित नहीं करते। यह एक गंभीर त्रुटि है, विविध भूगोल को एक ही मापदंड से आँकने की प्रवृत्ति। वास्तव में ऐसे क्षेत्रों के लिए तुलनात्मक मानक अंतर्राष्ट्रीय अनुभवों से लिए जाने चाहिए, जहाँ पर्वतीय या विरल जनसंख्या वाले क्षेत्रों को विशेष प्रतिनिधित्व और नीति-संवेदनशीलता प्रदान की जाती है। भारत जैसे विविध देश में यह अपेक्षा करना कि एक ही सूत्र सभी क्षेत्रों पर समान रूप से लागू हो सकता है, न तो व्यावहारिक है और न ही न्यायसंगत।
इसीलिए परिसीमन की आगामी प्रक्रिया में यह आवश्यक है कि पहाड़ी क्षेत्रों के प्रतिनिधित्व को केवल जनसंख्या के आधार पर न आँका जाए। भूगोल, संसाधन और पर्यावरणीय संवेदनशीलता को भी उतनी ही गंभीरता से मान्यता दी जानी चाहिए। यह किसी विशेषाधिकार की माँग नहीं, बल्कि संतुलित लोकतंत्र की आवश्यकता है।
अंततः यह प्रश्न केवल पहाड़ों की विशेष स्थिति जनित समस्याऔं का है, उतना ही लोकतंत्र की आत्मा का भी है। यदि कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में रहने वाले नागरिकों की आवाज ही कमजोर पड़ जाए, तो प्रतिनिधित्व कमजोर और अधूरा रह जाएगा।
उत्तराखंड की लोक-चेतना में एक क्रूर कहावत हमने लम्बे समय से सुनी है, ‘‘पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी, पहाड़ के काम न आयी।’’ आज स्थिति यह है कि पानी और जवानी, दोनों ही पहाड़ से दूर जा चुके हैं। यदि अब आवाज भी चली गई तो देवभूमि की जीवन शैली का क्या होगा और लोकतंत्र कैसे बचेगा और कैसा बचेगा ?
(लेखक एक सेवानिवृत्त रेल अधिकारी है और वर्तमान में भोपाल के निवासी हैं)































