बताते है कि मूल नक्षत्रों में पैदा होने वाले बच्चों का माँ-बाप परित्याग कर दिया करते थे। बाद में जब अघविश्वासों में वर्णित ‘अशुभ’ को ‘शुभ’ में बदलने के शॉर्टकट अपनाये जाने लगे सो ऐसे बच्चों को गाय की टाँगों से छिराया जाने लगा या उन्हें माई की भिक्षा की झोली में डालकर उनके अशुभ ग्रह शुभ में बदले जाने लगे। लेकिन इस उत्तराखण्ड का क्या करंे, जिसका जन्म, मूल नक्षत्र में हो रहा था। यह हाड़-माँस का जीवित प्राणी तो है नहीं कि इस गाय की टाँगों में छिराया जाये या माई की झोली में डालकर इसक अशुभ शुभ में बदले जा सकें। इसलिए भाजपा नेताओं ने राज्य के जन्म की घड़ी को ही शुभ लग्न के इन्तजार में नौ दिन बाद के लिए टाल दिया।
अविश्वास और विज्ञान का यह समन्वय अदभुत है। उत्तराखण्ड को ‘ई गवर्नेंस’ देने का वायदा करने वाली भाजपा अशुभ ग्रह दशा के सामने नतमस्तक हो गयी। इसे यों भी कहा जा सकता है कि पहले ही राउण्ड में ई गवर्नेस को उसकी औकात बता दी गयी है। भावी सरकार ने यह संकेत भी दे दिया है कि विज्ञान व तकनीक, बात-बहस के लिए तक तो ठीक है पर राजकाज के बड़े और अंतिम निर्णय विशेषज्ञों की सलाह पर नहीं, जोगी जमातियो के ‘सत्य वचनों’ के आधार पर ही किये जायेंगे। यह उल्लेखनीय है कि घोषणा के अनुसार एक नवम्बर को नयी सरकार अस्तित्व में आनी थी। इसकी तैयारियाँ भी पूरी कर ली गयी थीं। इस बीच भाजपा नेताओं ने उत्तराखण्ड की कुंडली ज्योतिषियों को दिखायी। ज्योतिषियों ने कहा कि इस दिन मूल नक्षत्र और धनु राशि है। इन दोनों का मेल घोर अशुभ पैदा करने वाला है। गणना करके यह भी बताया कि 9 नवम्बर अति शुभ घड़ी है। इस दिन नक्षत्र और राशि शुभ है। मुख्यमंत्री और मंत्री पदों के लिए लालायित भाजपा नेताओं ने शुभ घड़ी के इतजार में नौ दिन तक अपनी हसरतों पर लगाम कस ली। उन्हें विश्वास है कि शुभ घड़ी में राज्य गठित करके और कुछ करने की जरूरत नहीं है। यह स्वयं ही उत्तराखण्ड के दारुण दुखों का अंत कर देंगे। कुबेर अपने खजाने की वर्षा कर देंगे। राम राज आयेगा आदि आदि।
ऊपरी तौर पर सामान्य सी प्रतीत होने वाली इस घटना के निहितार्थ कहीं गहरे हंै। नये राज्य की बुनियाद किन सिद्धान्तों पर डाली जा रही है, यह उसकी झलक भी है और नये राज्य के भीतर बसने वाले अन्य सम्प्रदायों के लिए धमकी भरी सलाह भी कि उन्हें यहाँ के बहुसंख्यक समुदाय के अधविश्वासों को मानना ही होगा। अर्थात् भाजपा के सपनों के उत्तरांचल का यह एक ट्रेलर है। नये राज्य की बागडोर ऐसे कमजोर डरपोक और अधविश्वासियों के हाथ में जा रही है, यह चिंता की बात है। ऐसा नेतृत्व एक स्वस्थ लोकतांत्रिक और प्रगतिशील समाज के निर्माण में बाधा उत्पन्न करेगा। इससे भी ज्यादा निराशाजनक यह है कि अपने को उत्तराखण्ड की राजनैतिक ताकत और दबाव समूह कहने वाले दल या संगठनों ने इस घटना पर कोई टिप्पणी करने की भी जरूरत नहीं समझी। लगता है वे भी पैट-अपैट के चक्कर में है और अपने राजयोग के इतजार में कुण्डलियाँ बाँचने में व्यस्त है।
(राज्य गठन के ठीक पहले ‘नैनीताल समाचार’ के 15 अक्टूबर 2000 के अंक में पहली बार प्रकाशित)

































