राजीव लोचन साह
भारत-पाकिस्तान की हालिया झड़प की तरह अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा इजराइल और ईरान के बीच बारह दिन तक चले युद्ध में विराम लगने की घोषणा कर दी गई है और भारत-पाक युद्धविराम की ही तरह इसका श्रेय भी स्वयं ले लिया गया है। क्योंकि इस घोषणा के बाद भी दोनों देशों ने एक-दूसरे पर मिसाइल हमले किये हैं, अतः भरोसा नहीं हो पा रहा है कि युद्ध सचमुच रुक ही गया है। लेकिन अगर यह रुक जाये तो सारी दुनिया राहत की साँस लेगी, क्योंकि यह भारत-पाकिस्तान की तरह पृथ्वी के एक कोने पर सिमटा रहने वाला युद्ध नहीं था, बल्कि इसमें पूरे पश्चिम एशिया और योरोप के भी उलझ जाने की तमाम सम्भावनायें थीं। यह सचमुच तीसरा विश्वयुद्ध हो सकता था। हालाँकि ऐसी लड़ाई में किसी एक पक्ष को सही या गलत ठहराना कठिन है, तो भी यह कहने का जोखिम उठाया जा सकता है कि इस युद्ध में अमेरिका और इजराइल की सम्मिलित दादागिरी ज्यादा थी, ईरान की कम। अमेरिका के साथ द्विपक्षीय वार्ता में जुटे ईरान के परमाणु ठिकानों पर इजराइल द्वारा एकाएक, अकारण हमला कर उसके अनेक जनरलों को मार डालना कतई ज़ायज़ नहीं ठहराया जा सकता। ईरान ने तो एक स्वाभिमानी राष्ट्र की भाँति उस हमले का जवाब ही दिया था। फिलीस्तीन के अन्दर बार-बार युद्धविराम का उल्लंघन करने वाले इजराइल के मुँह में तो गज़ा पट्टी के हजारों मासूम बच्चों की हत्या का खून लगा हुआ है। मगर दुनिया के स्वयंभू भाग्यविधाता और नोबेल शान्ति पुरस्कार के दावेदार राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का व्यवहार इस दौरान कम आपत्तिजनक नहीं रहा। कभी उन्होंने ईरान के सुप्रीम लीडर खामेनी को अपदस्थ करने का इरादा जतलाया तो कभी युद्ध में सीधे हस्तक्षेप का फैसला दो सप्ताह में करने की घोषणा कर अगले ही दिन ईरान के परमाणु ठिकानों पर धावा बोल दिया। इस संक्षिप्त युद्ध ने एक ओर अमेरिका के लबारपने को उजागर किया तो दूसरी ओर इजराइल के अपराजेय होने के मिथक को नष्ट किया।

































