माया चिलवाल/विनीता यशस्वी
भले ही कोटद्वार की अदालत ने अंकिता भंडारी के तीनों हत्यारों को आजीवन कारावास की सजा सुना दी है, मगर इस प्रकरण में तमाम सवाल अभी भी अनुत्तरित ही पड़े हैं।
अंकिता की हत्या उसके परिवार, जनता और जांच एजेंसियों के लिए बिल्कुल भी रहस्यमय नहीं थी। वह जिस रिजाॅर्ट में काम करती थी, उसके मालिक ने रिजाॅर्ट में आने वाले वीआईपी अतिथि के साथ यौन संबंध बनाने से इनकार कर देने के कारण उसकी हत्या कर दी ताकि वह इस बात का खुलासा न कर दे। अंकिता रिजॉर्ट छोड़ना चाहती थी, इस बात की पुष्टि मृतका के व्हाट्सएप पोस्ट से होती है। वह अपने अंतिम समय तक रिजाॅर्ट मालिक और मैनेजरो के साथ देखी गई, चाहे सीसीटीवी फुटेज हो या उसके साथ काम करने वाले हाउसकीपिंग स्टाफ हो, जिन्होंने अंकिता से संबंधित बयान अदालत में दिए हैं। इन्हीं साक्ष्यों के आधार पर अदालत ने अपना निर्णय दिया।
यदि हम घटनाक्रम की शुरूआत में जायें तो अंकिता की गुमशुदगी की रिपोर्ट उसकी हत्या करने के बाद उसके रिजाॅर्ट मालिक पुलकित आर्य द्वारा ही दर्ज कराई गई थी। इससे यह साफ तौर पर दिखता है कि हत्यारे कितने शातिर हैं। अंकिता का दोस्त पुष्पदीप, कुछ पत्रकार, उसके पिता, जन संगठन और सोशियल मीडिया द्वारा अंकिता की हत्या को लेकर अब तक जो अपडेट मिली है उन्हीं आधार पर मुख्य प्रश्न अभी भी सब के मन में उठ रहे हैं।
त्रिभुवन चैहान ‘लोकार्पण’ चैनल चलाते हैं। उन्होंने वनंतरा रिजॉर्ट में अंकिता के कमरे का वीडियो बनाया था। उनका कहना था कि वीडियो बनाने के दिन अंकिता के कमरे में जो चादर थी, वह सीलिंग के दौरान गायब थी। इस बात की पुष्टि पत्रकार आशुतोष नेगी भी कर रहे हैं। 23 तारीख की दोपहर जब आशुतोष वनंतरा रिजाॅर्ट में गए तो उन्हें रिजॉर्ट कहीं से भी सील नहीं लगा। अंकिता के कमरे का बाहर का शीशा टूटा हुआ था और उसके बिस्तर पर डॉक्यूमेंट बिखरे हुए थे। उसका बैग साइड में पड़ा हुआ था, जिसकी चेन खुली थी। कुर्सी पर दो कटोरियाँ रखी थीं और रोटियां भी थीं। बिस्तर पर बेडशीट गायब थी। परंतु एस आई टी अदालत में कहती रही कि होटल को सील कर दिया गया था। वहाँ से फॉरेंसिक टीम को कोई बायलॉजिकल एविडेंस नहीं मिला। आखिर वह बेडशीट कहां गई ?
पौड़ी के जिलाधिकारी ने रिजाॅर्ट पर बुलडोजर चलाने के आदेश को नकारा, जबकि मुख्यमंत्री के ट्विटर हैंडल से यह बात पता चली कि रिजॉर्ट को बुलडोजर द्वारा ध्वस्त किया गया है। विधायक रेनू बिष्ट के कहने पर अंकिता का कमरा आंशिक रूप से ध्वस्त किया गया। यह बात अदालत में जेसीबी के ड्राइवर ने अपनी बयानों में कही। उसके इस बयान के बाद भी विधायक रेनू बिष्ट पर कोई मुकदमा नहीं चला और उनकी गिरफ्तारी भी नहीं हुई। एसआइटी ने उन्हें गवाह भी नहीं बनाया। जबकि रेनू बिष्ट अपराध स्थल सहित कीमती सबूतों को नष्ट करने की दोषी हैं। यहां पर एस.आई.टी की आपराधिक लापरवाही और दुर्भावना दिखाई देती है।
जब तीनों अपराधी गिरफ्तार हो गए तो उन्हें पुलिस रिमांड में न लेकर न्यायिक हिरासत में क्यों भेज दिया गया ? पुलिस रिमांड में यदि होते तो पुलिस उनसे कुछ न कुछ अपराध के संबंध में उगलवा लेती।
पोस्टमार्टम रिपोर्ट के आधार पर एस.आई.टी. का कहना है कि यह बलात्कार का मामला नहीं है। पोस्टमार्टम की रिपोर्ट के अनुसार मेडिकल टीम ने अदालत में माना कि यौन हमले की संभावना को खारिज नहीं किया जा सकता है। अंकिता की बॉडी पांच-छः दिन पानी में रहने व डिकंपोजिंग के कारण बॉडी टिश्यू और सबूत नष्ट हो गए होंगे। परंतु पोस्टमार्टम रिपोर्ट में यह स्पष्ट है कि उसे फोर्सफुली धक्का दिया गया। उसके फेफड़ों में नहर की रेत थी। लेकिन परिस्थितिजन्य साक्ष्य, 18 तारीख की शाम को घटित घटनाएं, कर्मचारियों की चश्मदीद गवाही एवं व्हाट्सएप चैट, और पुष्प के साथ हुई बातचीत से बलात्कार के सबूत निर्मित किए जाने चाहिए थे, जो एस.आई.टी ने नहीं किया।
इस मामले में वीआईपीकौन था ? पुलिस का कहना है कि वीआईपी शब्द का प्रयोग प्रेसिडेंशियल सुइट में ठहरने वाले लोगों के लिए किया जा रहा था। जिस वीआईपी का जिक्र व्हाट्सएप चैट में है, वह निश्चित रूप से शक्तिशाली व्यक्ति, राजनेता या कोई अन्य प्रभावशाली व्यक्ति है। क्या राजनीतिक कारणों से एसआइटी उसका नाम सामने नहीं ला पाई ?
पुलिस का कहना है कि अंकिता और पुलकित के मोबाइल बरामद नहीं हो सके, क्योंकि उन्हें चीला नहर में फेंक दिया गया था। यहाँ अंकिता की पुरानी चैट तो सर्विस प्रोवाइडर से ले ली गई, परंतु पुलकित की कोई भी चैट या अन्य डिटेल नहीं मांगी गई। पुलकित की 16, 17, 18 तारीख की फोन संबंधित जानकारी भी पुलिस सर्विस प्रोवाइडर से माँगती तो वीआईपी का पता निश्चित रूप से चल सकता था।
वीआईपी के नाम के खुलासे के लिए अंकिता के माता-पिता और पत्रकार आशुतोष नेगी हाई कोर्ट व सुप्रीम कोर्ट तक भी गए, इस दावे के साथ कि एसआईटी राज्य के दबाव में सही ढंग से जांच नहीं कर पा रही है, अतः यह केस एसआईटी से सीबीआई को ट्रांसफर कर दिया जाए। अपराधी पुलकित आर्य का संबंध राज्य की वर्तमान भाजपा सरकार से है। उसके पिता व भाई भाजपा ओबीसी प्रकोष्ठ में पदाधिकारी थे। एसआईटी ने क्यों नहीं तीनों अपराधियों के नारकोटिक्स टेस्ट की इजाजत अदालत से ली ? 30 अक्टूबर 2022 को पौड़ी की तत्कालीन एसएसपी द्वारा तीनों मुख्य आरोपियों पर गैंगस्टर एक्ट लगाया गया है, यह खबर उन दिनों मुख्य दैनिक अखबारों में आई थी। जब मुकदमा अदालत में आया, तब पता चला कि इस एक्ट से संबंधित कोई भी मुकदमा दर्ज नहीं किया गया है।
मुख्य आरोपी पुलकित की फैक्ट्री, जो वनंतरा रिजॉर्ट से लगी हुई है, में क्यों दो बार आग लगाएं गई या लगी जबकि फैक्ट्री और रिजॉर्ट दोनों पुलिस की निगरानी में थे ? आखिर वहाँ किस तरह के कार्य हो रहे थे ?
इन सवालों के जवाब कौन देगा?
अंकिता की गुमशुदगी के बाद से ही जनता आंदोलित हो गई। उसका शव मिल जाने के बाद से तो यह आन्दोलन निरन्तर तीव्र होता रहा। जनता की ओर से अदालत एवं सरकार पर अंकिता को न्याय दिलाने के लिए निरन्तर दबाव बनाया जाता रहा। यदि यह दबाव नहीं बनाया जाता तो जिस तरह का इस मामले में सरकार का रुख था तो अदालत से अपराधी छूट चुके होते। राज्य सरकार ने तो इस मामले में एक ऐसा लचर वकील नियुक्त किया था, जो गवाहों की गवाही भी ठीक से नहीं ले पा रहा था। शासन को दूसरा योग्य वकील मुहैया कराने के लिये अनेक प्रार्थना पत्र दिए गए, पर शासन ने एक न सुनी। अन्ततः अंकिता का परिवार इस माँग को लेकर धरने पर बैठा। तब जा कर वकील बदला गया। हालाँकि अंकिता का परिवार और उत्तराखंड की जनता इस निर्णय को ‘अधूरा न्याय’ मानते हुए हत्यारों को फांसी देने की माँग कर रहे थे। उत्तराखंड राज्य के गठन के बाद यह शायद पहला और फाँसी के लिये सर्वथा उपयुक्त ‘रेअर आॅफ रेअरेस्ट’ केस है।
अब अंकिता के पिता वीरेन्द्र भंडारी ने उत्तराखंड के मुख्यमंत्री को पत्र लिख कर यह माँग कर भी दी है कि तुरन्त हाईकोर्ट में अपराधियों की सजा में अभिवृद्धि के लिये अपील की जाये और उन्हें मृत्युदण्ड दिलवाने के लिये एक विशेष योग्य अभियोजक की नियुक्ति भी की जाये। यह बेहद जरूरी माँग है और इसके लिये उत्तराखंड की जनता को एक बार फिर से सशक्त आन्दोलन करना होगा। 14 साल का आजीवन कारावास छुट्टियाँ आदि काट कर वास्तव में लगभग दस साल का रह जाता है, जिसमें से लगभग तीन साल ये लोग काट भी चुके हैं। तीन-चार साल बाद इनके अच्छे आचरण का हवाला देते हुए सरकार इन्हें जेल से रिहा कर देगी, जैसे गुजरात में बिल्कीस बानो के बलात्कारियों को किया गया था। तब फूलमालाओं से और मिठाई खिला कर इनका स्वागत किया जायेगा। जिस तरह अदालत से सजा सुन कर ये अपराधी हँसते हुए और हाथ हिलाते हुए ये अपराधी जेल गये, उससे साबित होता है कि वे आश्वस्त है कि उनके मामले में ऐसा ही होगा।
अंकिता हत्याकांड को लेकर जनता में उमड़ रहे आक्रोश को शान्त करने के लिये मुख्यमंत्री द्वारा यह घोषणा की गई थी कि अंकिता के गांव डोभ श्रीकोट में अंकिता के नाम से नर्सिंग कॉलेज खोला जायेगा। इसका काम भी अंकिता के परिवार के धरने के बाद शुरू हुआ, लेकिन यह भी अभी लटका हुआ ही है। जनता की माँग के बावजूद अंकिता के पिता व भाई को कोई सरकारी नौकरी नहीं मिली।
अंकिता भंडारी हत्याकांड में सीबीआई जांच की मांग के बाद, सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता कोलिन गोंजाल्विस ने एक बहुत ही भावुक पत्र लिखा, जो यहाँ दिया जा रहा है:
मुझे खेद है अंकिता…
मुझे खेद है अंकिता कि आपकी हत्या की सीबीआई जांच की मांग करने वाले सुप्रीम कोर्ट में आपके मामले का निपटारा कर दिया गया और ।हम अभी तक मुख्य अपराधी को पकड़ने में कामयाब नहीं हुए हैं। मुझे खेद है सोनी देवी, आपकी प्यारी बेटी की हत्या के लिए एक वीआईपी ने होटल में काम करने वाली एक छोटी लड़की अंकिता से ‘विशेष सेवाएं’ मांगी। उसके इनकार के कारण उसकी हत्या हो गई।
मुझे इस बात का भी दुःख है कि हमारा पुलिस बल राजनेताओं के सामने इतना झुक गया है कि वह किसी भी अपराध को छुपाने के लिए तैयार हो जाता है। सबसे पहले अंकिता और उसके दोस्त पुष्पदीप के बीच व्हाट्सएप चैट, जिसमें उसने शिकायत की थी कि एक वीआईपी उसके होटल में आ रहा था और उससे विशेष सेवाओं की मांग कर रहा था, उसे उत्तराखंड पुलिस ने चार्जशीट से हटा दिया। उन चैट में उसने अपने दोस्त से तुरंत आने और उसे बाहर ले जाने के लिए कहा। दूसरे, उसके दोस्त पुष्पदीप और वीआईपी के सहयोगी के बीच स्विमिंग पूल में हुई बातचीत का चार्जशीट में उल्लेख नहीं किया गया, जबकि पुष्पदीप ने पुलिस द्वारा दिखाए गए फोटो के आधार पर सहयोगी की पहचान की थी।
तीसरे, सहयोगी अपने बैग में नकदी और हथियार लेकर जा रहा था और फिर भी उसे न तो आरोपी बनाया गया और न ही पुलिस ने उससे पूछताछ की। चैथे, होटलकर्मी अभिनव का यह बयान कि अंकिता को जबरन बाहर निकालकर हत्या करने से पहले वह अपने कमरे में रो रही थी, चार्जशीट में उल्लेख नहीं किया गया। पांचवे, जिस कमरे में अंकिता रुकी थी, उसकी प्रयोगशाला की फोरेंसिक रिपोर्ट को कभी भी चार्जशीट में संलग्न नहीं किया गया। छठा, अपराध स्थल यानी जिस कमरे में वह रुकी थी, उसे स्थानीय विधायक और मुख्यमंत्री के आदेश पर तुरंत ध्वस्त कर दिया गया।
सातवां, वीआईपी से बातचीत कर रहे होटल के कर्मचारियों का मोबाइल फोन कभी जब्त नहीं किया गया। आठवां, होटल का सीसीटीवी फुटेज, जिससे वीआईपी और उनके साथियों की पहचान स्पष्ट रूप से पता चलती, कभी भी इस सुविधाजनक बहाने से पेश नहीं किया गया कि कैमरे काम नहीं कर रहे थे। नौवां, जिन गवाहों ने गवाही दी कि अंकिता अपनी मौत से पहले परेशान थी, उनकी कभी ठीक से जांच नहीं की गई। दसवां, उत्तराखंड पुलिस द्वारा दिया गया बयान कि कॉल डिटेल रिकॉर्ड की जांच की गई थी और कुछ भी अप्रिय नहीं दिखाया गया था, भ्रामक था क्योंकि रिकॉर्ड केवल मृतक की चैट के संबंध में था, होटल कर्मचारियों के बारे में नहीं।
अंत में, एक आरोपी के साथ मोटरसाइकिल पर पीछे बैठी अंकिता को दिखाने वाले वीडियो का अभियोजन पक्ष द्वारा गलत उल्लेख किया गया था, जो यह दर्शाता है कि उसकी हत्या और नहर में शव फेंकने से पहले वह किसी भी तरह की परेशानी में नहीं दिख रही थी। हालांकि, पुष्पदीप ने अदालत में पेश किए गए साक्ष्य में कहा कि मोटरसाइकिल पर बैठी अंकिता ने उसे फोन किया और कहा कि वह बहुत डरी हुई है, क्योंकि वह लोगों से घिरी हुई है और बात नहीं कर पा रही है।मुख्य आरोपी पुलकित आर्य ने अब ट्रायल कोर्ट से खुद का नार्को विश्लेषण करने का अनुरोध किया है, जिससे संकेत मिलता है कि वे घटनाओं के बारे में साफ-साफ बताने के लिए तैयार हैं, लेकिन ट्रायल कोर्ट ने आवेदन को खारिज करके समय से पहले ही मामले को खत्म कर दिया। आरोपियों द्वारा खुद की ऐसी गवाही से वीआईपी की पहचान और भूमिका सामने आ जाती। पुलिस ने वीआईपी की पहचान छिपाई है। सीबीआई को जांच अपने हाथ में लेने और आगे की जांच करने का निर्देश देकर इस बाधा को दूर किया जा सकता था।
मां ने अधिकारियों को लिखे पत्र में आरोप लगाया कि वह एक उच्च पदस्थ राजनीतिक पदाधिकारी थे, जो अक्सर अपनी पार्टी के सदस्यों के साथ होटल में आते थे। सीसीटीवी फुटेज या कर्मचारियों के मोबाइल फोन प्राप्त करने के लिए उठाए गए प्राथमिक कदम भी मुख्य अपराधी की पहचान उजागर कर देंगे। क्षमा करें अंकिता। यह भारत है। आम महिलाओं की जिंदगी मायने नहीं रखती और उच्च और शक्तिशाली लोग बार-बार बच निकलते हैं।
कॉलिन गोंसाल्वेस, (वरिष्ठ अधिवक्ता, सुप्रीम कोर्ट)

































