रमेश कृषक
उत्तराखण्ड में मशीनी छेड़छाड़ और प्राकृतिक आपदाओं की तेजी से बढ़ती श्रृंखलाओं को सामने रख कर देखने से तो यह कहने में कोई दिक्कत नही हो रही है कि अगर सत्ता को जनता की चिन्ता होती तो वह आपदा की हर घटना से सबक सीखने को प्रतिबद्ध रहती। मगर यहां सत्ता का चरित्र विपरीत है। आपदाओं के मामलों में सत्ता सच को छुपाने, दोषारोपण करने और अपना बचाव करने का हर सम्भव प्रयास करती मिलती है। यह आरोप एक दो घटनाओं पर आधारित नही है। 1980-81 में कर्मी की आपदा, जगथाना, मालपा, देवर खडेरा, मीन गधेरा, अगस्त मुनि क्षेत्र की श्रृंखलाबद्ध घटनाओं, शुम्भ गढ़ और अन्य बहुत सारी खूनी घटनाओं के बाद 2013 की हजारों हजार जानें लील गई केदारनाथ की त्रासदी से जब सत्ता और सत्तासीनों ने कोई सबक नही सीखा तो यह मानना कि अक्टूबर 2021 के दूसरे पखवाड़े में में घटी आपदा से सरकार सबक लेगी कसप कसप ही है।
इसमें दो राय नही कि विकास के जिस रास्ते पर हम चल रहे हैं वह भले ही एक निश्चित और सीमित समय के लिये बजटीय योजनाओं के विकास से हमें जोड़ रहा है, परन्तु भूमि की ऊपरी सतह को इतना अधिक प्रभावित कर रहा है कि हजारों हजार सालों तक या फिर आन्तरिक भ्रंशों के टकराने की प्रक्रिया तक ये जख्म बने रहेंगे।
राज्य बनने के बाद उत्तराखण्ड में बहुत सी ऐसी योजनाओं पर काम हुआ है, जिनकी इजाजत पहाड़ों की संरचना नहीं ही देती है। ऐसी योजनाओं में ऋषिकेश से कर्णप्रयाग रेल लाईन और पूरे उत्तराखण्ड में बनाई जा रही ऑल वैदर सड़कों पर बात-बहस होनी ही चाहिये। थोड़ी देर के लिये मान लेते हैं कि रेल लाईन सामरिक महत्व के लिये जरूरी थी, क्योंकि यह सैन्य आवाजाही की 12-14 घण्टों की दूरी को 2-3 घण्टों में समेट रही है, लेकिन ऑल वैदर सड़क के नाम से भीमकाय राक्षसीय मशीनों को उत्पात मचाने की इजाजत क्यों दी गई ? इसी पखवाड़े की बरसात में ऑल वैदर सड़कों का सच भी सामने आ ही गया। ऑल वैदर सड़क काटने में भूमि का जो भाग मलवे में तब्दील हो गया वह कहां फेंका गया ? क्या गारंटी है कि वह मलवा नदियों को प्रभावित नहीं करेगा ?
विकास के लिये विनाश की जो इबारत लिखी जा रही है, उसका अध्ययन सत्तायें और राजनैतिक दल क्यों नही करवा रहे हैं ? वर्तमान राजनैतिक दलों की सत्तायें यह काम कभी भी नही करेंगी। सर्वस्वीकार्य है कि पोकलैण्ड और जेसीबी मशीनें पहाड़ों की संरचना के लिये बहुत अधिक घातक हैं। यह भी सर्वमान्य है कि इन मशीनों ने श्रमिकों के हाथ काट लिये हैं। इन सर्वमान्यता के बाद भी पहाड़ों पर बच्चों के खिलौनों की तरह ये मशीनें चढ़ाई जा रही हैं। हिमालय की चिन्ता करने वाले भू वैज्ञानिकों ने बहुत पहले ही जेसीबी और पोकलैन्ड जैसे खतरनाक लौह राक्षसों को पहाड़ों पर न चढ़ाने की चेतावनियां दे दी थीं।
थोड़ा सा पीछे पलट कर देखें तो 1970 से 1980 के बीच उत्तराखण्ड में चला वन आन्दोलन पेड़ लगाने या पेड़ बचाने का आन्दोलन कतई नहीं था। वह आन्दोलन तेजी से बढ़ रही बाढ़ों, भूस्खलनों, भू कटावों, आधुनिक विकास की बलि चढ़ती पारिस्थितिकी को बचाने का आन्दोलन था। 1970 से 1980 के बीच चले वनान्दोलन में चिपको तो बस छोटे से एक गांव के स्तर पर घटित छोटी सी घटना मात्र थी। इस घटना के बाद बाढ़ों, भूस्खलनों, भू कटावों, आधुनिक विकास की बलि चढ़ती परिस्थितिकी को बचाने का आन्दोलन कहीं नेपथ्य में चला गया। बहुत ही बेशर्मी से हमने उस जरूरी मुद्दे को नेपथ्य में जाने दिया। परिणाम आज भी बाढ़ों, भू स्खलनों, भू कटावों, आधुनिक विकास की बलि चढ़ती पारिस्थितिकी को बचाने के लिये बड़े जन आन्दोलन की जरूरत अपनी जगह मुँह बाये खड़ी है।
चर्चा को आगे बढ़ाने के लिये इस बात पर मनन करना जरूरी है कि योजना के निर्माण के समय योजना की उम्र क्यों छुपाई जाती है ? क्या सरकार ने निर्माण से पहले लोगों को कभी बताया कि टिहरी डैम की निर्धारित उम्र कितनी है ? पंचेश्वर डाम के निर्माण के लिये प्रतिबद्ध सरकारें और राजनैतिक दल पंचेश्वर डैम की असल उम्र बताने से क्यों कतरा रहे हैं ? सीधी सी बात है कि जब सरकारें किसी भी योजना की असल उम्र बताना प्रारम्भ कर देंगी तो हजारों हजार सालों से अपने स्थान पर स्थापित समाज को राष्ट्र के विकास के नाम पर उसके स्थान से बेदखल करना कठिन हो जाएगा।
आज की तारीख में सवाल राजनैतिक दलों से पूछा जाना चाहिये कि भू वैज्ञानिकों की चेतावनियां उनके लिये चिन्ता का विषय क्यों नहीं है ? ये सवाल न तो सरकारी भू वैज्ञानिक पूछेंगे न ही बड़े-छोटे पुरस्कारों से अच्छे—अच्छे पर्यावरणविद ही पूछने की हिम्मत जुटा सकेंगे। आश्चर्य तो इस बात का है कि पर्यावरण संरक्षण पर एक के बाद एक रिसर्च करवा रहे शिक्षाविद भी विकास के नाम पर परोसे जा रहे महाविनाश पर शोध करवाने की हिम्मत नहीं बटोर पा रहे हैं।
निश्चित जानें कि अक्टूबर 2021 के दूसरे पखवाड़े के प्रारम्भ में बारिश ने जो उत्पात मचाया है, वह उत्पात अन्तिम नहीं है। यह भी जान लें कि जिस और जैसे राजनैतिक ढांचे को हम ढो रहे हैं, वह ढांचा पहाड़ के संरक्षण व सम्वर्द्धन के लिये न पहले कभी प्रतिबद्ध था और न अभी है। चिन्ता जनता को ही करनी होगी। नौजवानों को यह तो स्वीकार ही लेना चाहिये कि टूटे-फूटे और लुटे-पिटे पहाड़ पर आपकी जवानी में मुस्कराहट और बुढ़ापे में समृद्धता सम्भव नहीं है।