जगमोहन रौतेला
पिछले डेढ़-दो महीने से एक ऐसा भयावह व चिंताजनक दौर चल रहा है जब हर रोज कहीं न कहीं से अपने प्रियजनों के असमय कालकलवित होने की खबरें आ रही हैं। असमय जाने वालों में परिजन भी शामिल हैं तो विभिन्न क्षेत्रों के जाने पहचाने चेहरे भी। कल 17 मई का दिन भारतीय इतिहास व साहित्य के लिए अपूरणीय क्षति का दिन रहा। पहले तड़के ही सुप्रसिद्ध इतिहासकार प्रो. लालबहादुर वर्मा के अनन्त यात्रा पर चले जाने का समाचार मिला।
लोग अभी इस सदमे से उबर भी नहीं पाया थे और सोशल मीडिया के विभिन्र माध्ययों से उन्हें श्रद्धाजंलि दे ही रहे थे कि देर रात लगभग नौ बजे साहित्यिक पत्रिका आधारशिला के चर्चित सम्पादक दिवाकर भट्ट के भी लगभग एक महीने अस्पताल में भर्ती रहने के बाद अनन्त यात्रा पर चले जाने का पीड़ादायक समाचार मिला। देर रात को मिली इस खबर को जिसने भी सुना,उसे विश्वास ही नहीं हुआ। विश्वास होता भी कैसे? क्योंकि तीन-चार पहले ही उनके कोविड-19 के संक्रमण से मुक्त होने की खबर लोगों को मिली थी। जिसके बाद साहित्य व संस्कृति जगत के सभी लोगों को विश्वास हो चला था कि दिवाकर भट्ट शीघ्र ही स्वस्थ होकर हम सब के बीच होंगे औरअपनी अनवरत चलने वाली साहित्य की गतिविधियों से हिन्दी साहित्य समाज को लाभान्वित करेंगे। पर काल की नियति को यह मंजूर नहीं था।
कोविड के संक्ररण से मुक्त होने के बाद दिवाकर भट्ट को सॉस लेने में परेशानी हो रही थी। इसी कारण उन्हें अस्पताल से घर नहीं भेजा गया था। संक्रमित होने के बाद भट्ट को गत 18 अप्रैल 2021 को हल्द्वानी के निजी चिकित्सालय नीलकंठ में भर्ती किया था। जहॉ लगातार उपचार के बाद उनके स्वास्थ्य में सुधार हुआ और उन्हें एक बार आईसीयू से सामान्य वार्ड में भर्ती कर लिया गया था। उनके स्वास्थ्य पर महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी अपने ओएसडी धुव्र रौतेला के माध्यय से लगातार नजर बनाए हुए थे। दिवाकर को स्वास्थ्य को लेकर कोश्यारी नीलकंठ अस्पताल के निदेशक डॉ. गौरव सिंघल के भी सम्पर्क में थे और उन्हें कहा गया कि अगर उन्हें हायर सेंटर ले जाने की आवश्यकता होगी तो इस बारे में तुरन्त सूचित किया जाय,ताकि दिवाकर भट्ट को हायर सेन्टर ले जाया जा सके।
वरिष्ठ कथाकार गम्भीर सिंह पालनी ने गत 16 मई को अपनी फेसबुक वॉल पर दिवाकर भट्ट के स्वास्थ्य के बारे में जानकारी देते हुए लिखा था कि ‘आधारशिला ‘ पत्रिका के सम्पादक दिनेश भट्ट ‘दिवाकर’ के कोरोनाग्रस्त होने के कारण हल्द्वानी के नीलकंठ हॉस्पिटल में भर्ती होने की जानकारी राजा खुगशाल जी की पोस्ट से 4 दिन पूर्व मिली थी। उसके बाद मैंने उनके पुत्र कुशाग्र भट्ट का मोबाइल नम्बर प्राप्त कर उस से बात कर के दिवाकर भट्ट के स्वास्थ्य के बारे में जानकारी ली थी। कुशाग्र ने बतलाया था कि दिवाकर जी को अब कोरोना तो नहीं है, लेकिन उन्हें हॉस्पिटल के ही प्राइवेट वार्ड में शिफ्ट कर दिया गया है। उन्हें सॉस लेने में तकलीफ बनी हुई है। आज शाम को कुशाग्र को पुनः फोन करने पर उन्होंने बतलाया कि अभी दिवाकर जी के स्वास्थ्य में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ है।
उसके बाद 17 तारीख को उनका स्वास्थ्य अचानक से काफी बिगड़ गया और उन्हें फिर से आईसीयू में भर्ती करना पड़ा। जहॉ रात लगभग साढ़े नौ बजे उन्होंने अंतिम सॉस ली। पिछले लगभग तीन दशक से अपना जीवन हिन्दी के उन्नयन के लिए समर्पित कर देने वाले दिवाकर भट्ट का जन्म एक जुलाई 1963 को बागेश्वर जिले के कांडा क्षेत्र के पटाडुंगरी गॉव में हुआथा। वह विगत 36 वर्षों से हिन्दी की साहित्यिक पत्रिका आधारशिला का प्रकाशन और सम्पादन कर रहे थे। साथ ही वह अमर उजाला में रानीखेत, अल्मोड़ा व हल्द्वानी में संवाददाता और सम्पादकीय पदों पर भी रहे। पत्रकारिता में वह बैंक की नौकरी से त्यागपत्र देकर आए थे। अमर उजाला के अलावा उन्होंने दैनिक जागरण और पीटीआई के लिए भी पत्रकारिता की। उन्होंने विश्व हिन्दी अभियान के तहत 2004 से 25 से अधिक देशों की यात्राएँ की और वहॉ पर विश्व हिन्दी सम्मेलनों का आयोजन करवाया। जिनमें भारत के साथ ही विभिन्न देशों के हिन्दी के विद्वान भाग लेते थे।
दिवाकर भट्ट ने प्रसिद्ध चित्रकार हरिपाल त्यागी के कला कर्म पर चर्चित पुस्तत “हरिपाल त्यागी : कला-सृजन एवं विवेचन” और बल्लभ डोभाल होने के मायने पुस्तक का भी सम्पादन किया था। उन्होंने आधारशिला पत्रिका के इतिहास में महादेवी वर्मा, पंजाबी युवा कथा विशेषांक, हरिपाल त्यागी की कला के मायने, वामिक जौनपुरी अंक, ग़ज़ल विशेषांक, पानू खोलिया का कथा संसार, वीरेन डंगवाल : मैं कवि हूँ, पाया है प्रकाश , विश्व कविता पर दो विशेषांक , तेलगु साहित्य पर दो विशेषांक और गत जनवरी 2021 में मंगलेश डबराल अंकों का विशेषतौर पर सम्पादन किया। जो बहुत ही चर्चित होने के साथ ही संग्रहणीय भी रहे हैं। इसके अलावा उन्होंने आधारशिला प्रकाशन से देश व विदेश के कवियों, लेखकों, कथाकारों की तीन दर्जन से अधिक पुस्तकों भी प्रकाशन भी किया।
हिन्दी भाषा के प्रचार-प्रसार में उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए उन्हें राहुल सांकृत्यायन सम्मान, पं.मदन मोहन मालवीय पत्रकारिता सम्मान, साहित्य गौरव सम्मान, आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी सम्मान , साहित्य श्री सम्मान , विद्या वाचस्पति, विश्व हिन्दी अग्रदूत सम्मान आदि से विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित किया गया था। हिन्दी भाषा व साहित्य के प्रचार-प्रसार के लिए भट्ट ने हल्द्वानी में उत्तराखण्ड अध्ययन केन्द्र की स्थापना भी की थी। जिसमें कई हजार पत्र -पत्रिकाएँ और विभिन्न लेखकों की पुस्तकों का संग्रह है। वह आधारशिला फाउंडेशन के अध्यक्ष भी थे। वह अपने पीछे पत्नी पुष्पा भट्ट , बेटी आकांशा और बेटे कुशाग्र को शोकाकुल छोड़ गए हैं।
अपने शोक संदेश में कुमाउनी के वरिष्ठ कवि जगदीश जोशी कहते हैं,”इसी साल जाड़ों में वे मेरे घर आये थे। मुझे आधारशिला का पाठक भी बना गये। चाय के लिए पूछा तो कहने लगे,”मैं तो केवल काढ़ा पी रहा हूँ। तब हमने उनके लिए काली मिर्च, अदरक और तुलसी की पत्तियॉ उबाली। बिल्कुल चलते-फिरते, स्वस्थ थे। काल की गति बहुत ही क्रूर चल रही है। नहीं पता कब कौन चला जाय?
वरिष्ठ पत्रकार गिरीश रंजन तिवारी ने कहा कि दिवाकर भट्ट का यों असमय चला जाना बुरी तरह से झकझोर गया। दिल टूट गया है ये खालीपन कभी भी नहीं भर सकता। दिवाकर तुम बेहद याद आओगे, हमेशा। इस कोरोना काल में लगातार तीन बेहद करीबी, घनिष्ठ मित्र और लंबे समय तक पत्रकारिता के तीन साथियों का यों चला जाना बहुत ही पीड़ादायक है। पहले दीप जोशी, फिर प्रशांत दीक्षित और अब दिवाकर….।
दिवाकर भट्ट से जुड़े अनगिनत संस्मरण हैं। दशकों तक अमर उजाला में साथ में पत्रकारिका से लेकर साथ में तमाम देशों की यात्राओं से जुड़े हुए। दिवाकर को मैंने जाना और समझ तो हर वक्त हिंदी को विश्व स्तर पर प्रतिष्ठित करने की उनकी जिद और मुहिम को लेकर। दिल में बसा है उनके खुलकर ठहाके लगा कर हंसने का खास अंदाज। हिंदी भाषा को विश्व भर में एक विशिष्ट पहचान दिलाने और राष्ट्रसंघ की स्वीकृत भाषा का दर्जा दिलवाने के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर देने वाले दिवाकर भट्ट के असामयिक निधन से इस क्षेत्र में जो शून्य पैदा हुआ है उसकी भरपाई शायद ही कभी हो सके। हिंदी के प्रचार प्रसार के लिए उन्होंने विश्व के तमाम देशों में बड़े-बड़े सम्मेलन आयोजित कराए।
बहुत कम उम्र से ही बीते दो दशक से वे इतने गंभीर और महत्वपूर्ण मिशन में लगे थे और विश्व के हर प्रमुख देश में हिंदी के लिए कार्यरत बड़ी बड़ी संस्थाओं के पदाधिकारियों सहित अंतरराष्ट्रीय स्तर के दिग्गज साहित्यकारों से उनके बहुत घनिष्ठ संबंध थे। इन के साथ मिलकर उन्होंने हिंदी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित करने को अपने जीवन का मकसद बनाया।
भट्ट ने अपने मिशन के सिलसिले में मॉरीशस के अलावा हंगरी, नीदरलैंड, थाईलैंड, सिंगापुर, श्रीलंका, इंग्लैंड सहित तमाम देशों में अनेक बार सम्मेलन आयोजित कराए।
भूपेन्द्र बिष्ट ने अपने भट्ट के निधन पर शोक व्यक्त करते हुए कहा कि किसी अख़बार या पत्रकारिता के पेशे से संपृक्त होना दिवाकर का परिचय नहीं, अपितु हल्द्वानी जैसे छोटे शहर से “आधारशिला” ( युवा चेतना की जरूरी पत्रिका ) सरीखी बड़ी पत्रिका निकालते जाना उन्हें स्वयं ज्ञापित करता रहा। देश भर में साहित्य के लिए समर्पित पत्रिकाओं में आज आधारशिला शुमार है। पत्रिका के वीरेन डंगवाल, मंगलेश डबराल, शैलेश मटियानी, कहानीकार पानू खोलिया, चित्रकार हरिपाल त्यागी तथा वामिक जौनपुरी आदि-आदि पर केंद्रित कुछ अंक संग्रहणीय हैं तो सिर्फ़ इसलिए कि वे जैसी विरल सामग्री विषय के लिए जुटाते थे और जिस कोटि का श्रम दिवाकर संबंधित अंक के लिए करते/ कराते थे, वह पढ़ने वालों को उनका मुरीद बना कर ही छोड़ता था। समादृत लेखक आधारशिला को अपना रचनात्मक योगदान देने को सर्वदा तरजीह दिया करते, इसका प्रमाण यही कि सभी समकालीन कद्दावर कलमकार किसी न किसी अंक में मौजूद मिला करते।
पिछले दो दशकों से दिवाकर हिंदी भाषा को संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा बनाने के एकल अभियान में जुटे हुए थे। इस क्रम में उन्होंने मारीशस, सिंगापुर, वियतनाम, हंगरी, उज़्बेकिस्तान, स्विट्जरलैंड, फ्रांस, हॉलैंड, जर्मनी और इंग्लैंड जैसे देशों में हिंदी सम्मेलनों का आयोजन कर हिंदी भाषा से प्रवासियों के साथ वहॉ के निवासियों को भी जोड़ने का काम किया। उनका कहना था कि विदेश में बसे भारतीयों के सिवा वहॉ के अन्य लोगों में भी हिंदी के प्रति गजब का उत्साह मैंने देखा है। भारतीय साहित्य, संस्कृति और लोक परंपराओं को बाहर भी जानने की रुचि मिलती है, इसमें हिंदी फिल्मों की भी बड़ी भूमिका है। इन दिनों दिवाकर भट्ट ने वियतनाम के साहित्य अनुवाद का काम भी हाथ में लिया था। बेहद सरल स्वभाव के दिवाकर मेरे ऐसे सखा बन गए थे कि राजकीय सेवा के दौरान मेरी तैनाती की जगहों में उनका आना होता तो मेरे साथ ही रुकते या मुझसे मिले बगैर वे जाते नहीं थे। लखनऊ में ‘जनसंदेश टाइम्स’ के संपादक, लेखक सुभाष राय ने सृजन पृष्ठ पर मेरी गज़लें प्रकाशित की तो दिवाकर भी आधारशिला में प्रकाशनार्थ मेरी ग़ज़ल ले गये और प्रकाशित भी की, बाद में कविताएँ भी। इसी तरह हमारे ही विभाग के एक अधिकारी और रचनाधर्मी मित्र डी.डी. दीक्षित का भारतीय ज्ञानपीठ से “धुआं और चीखें” उपन्यास आया तो उसकी समीक्षा भी आधारशिला के लिए मुझसे लिखवाई। एक युवतर और उत्साही मित्र दिवाकर का अनुराग भी अब शेष हो गया, विनम्र श्रद्धांजलि।
हिन्दी के वरिष्ठ कवि शैलेय ने कहा कि दिवाकर भट्ट का जाना साहित्य तथा उत्तराखंड के लिए बहुत बड़ी क्षति है। आज की तारीख में आधारशिला एक महत्वपूर्ण साहित्यिक मंच का कार्य संपादन कर रही थी। वह बहुत से रचनाकारों को आगे लेकर आई पत्रिका है। दिवाकर को हमेशा याद रखा जाएगा। साहित्यकार दिनेश जोशी ने कहा कि आधारशिला पत्रिका के यशस्वी सम्पादक,वरिष्ठ पत्रकार, समर्पित भाषा सेवी,साहित्यकार दिवाकर भट्ट हमारे बीच नहीं रहे।यह बेहद शोकाकुल व स्तब्धकारी खबर है। दिवाकर भट्ट हम सबको प्रेरित करने वाले आत्मीय मित्र थे। साहित्य व भाषा की उन्नति के लिए उन्होंने अपना जीवन होम कर रक्खा था।शहर शहर जाकर साहित्यिक मित्रों से मिलना, आधारशिला के अंक पकड़ाना,लिखने पढ़ने हेतु प्रोत्साहित करना उनका जैसे एकमात्र ध्येय था। हल्द्वानी जैसे छोटे शहर से लगातार पिछले तीस वर्षों से उत्कृष्ट साहित्यिक पत्रिका का प्रकाशन कर देश-विदेश तक इस शहर की सांस्कृतिक पहचान बनाने में भी उनका योगदान कम नहीं है। साथ ही वृद्ध, उपेक्षित साहित्यकारों पर आधारशिला के बेहतरीन संग्रहणीय अंक निकाल कर उन्होंने अनूठा काम किया। हाल के वर्षों में हिन्दी को अन्तर्राष्ट्रीय भाषा बनाने के मिशन में जुटे भट्ट जी ने कई देशों की यात्रा की तथा बाहर के मुल्कों में हिन्दी के प्रचार-प्रसार हेतु अथक प्रयास किया। उनसे अभी काफी अपेक्षाएं थी, लेकिन नियति के क्रूर पंजों ने असमय ही उन्हैं हमसे छीन लिया है। आधारशिला पत्रिका चलती रहे,तथा साथियों द्वारा उनका मिशन आगे बढ़ाया जाता रहे,यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। ●