योगेश भट्ट
गैरसैंण में बीते दिनों जो हुआ ठीक नहीं हुआ । लाठीचार्ज, पथराव, पब्लिक और पुलिस के बीच संघर्ष, गिरफ्तारियां, मुकदमे, जांच, आरोप प्रत्यारोप आदि आदि…आंदोलनों में अक्सर यह सब होता है। उत्तराखंड का तो जन्म ही इस सबके बीच हुआ और जन्म के बाद भी इसका बना हुआ है।
कई मौकों पर तो बात इससे और आगे भी निकली, मगर आंदोलन और आंदोलनकारियों पर सवाल नहीं उठे। सवाल तो हमेशा से सरकारों पर ही रहे हैं। लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि अब तो सरकार ही आंदोलन और आंदोलनकारियों पर सवाल उठाने लगी है । तीन महीने से मात्र 19 किलोमीटर सड़क को चौड़ा करने की एक छोटी सी मांग कर रहे आंदोलनकारी भी सरकार को खटकने लगे हैं ।
दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि जनता के चुने नुमाइंदे भी जनता की पैरवी के बजाय उल्टा जनता के आंदोलन पर सवाल उठा रहे हैं । लाठीचार्ज और पत्थराव को मुददा बनाकर जनता के मुददों को जबरन सियासी बनाने की कोशिश की जा रही है।
गैरसैण में जो कुछ हुआ उसे बहुत गहरे से समझने की जरूरत है। दरअसल मुददा आंदोलन नहीं है, मुददा लाठीचार्ज नहीं है, मुददा पत्थरबाजी भी नहीं है। मुददा है सरकार की कार्य संस्कृति। मुददा सिस्टम की संवेदनशीलता और जनता के प्रति जवाबदेही का है। मुददा जनआंदोलन पर हर बार होती सियासत का है। मुददा जनप्रतिनिधियों के अहंकार का है।
मुददा सत्ता पक्ष और विपक्ष का कतई नहीं है, मुददा जनपक्ष का है। मुद्दा उस लोकतंत्र का है जिसके केंद्र में लोक नहीं है। मुद्दा यह है कि जनता द्वारा जनता के लिए चुनी गई सरकार में जनता की सुनवाई क्यों नहीं है ? बीते दिनों गैरसैण में विधानसभा सत्र के पहले दिन जो हंगामा मचा वह राज्य के सीमांत जिले चमोली जिले में एक संपर्क मार्ग के चौड़ीकरण की मांग को लेकर हुआ। तकरीबन नब्बे दिन से घाट क्षेत्र के आम लोग इसलिए धरने पर हैं कि वह अपने इलाके की सड़क नंदप्रयाग-घाट को चौड़ा कराना चाहते हैं।
मौजूदा मुख्यमंत्री समेत दो मुख्यमंत्री इसकी घोषणा कर चुके हैं कि उनकी सड़क को एक लेन से डेढ़ लेन कर दिया जाएगा। बजट की व्यवस्था भी हो चुकी है मगर मुख्यमंत्री की घोषणा के बावजूद विभाग सड़क को डेढ़ लाइन करने को तैयार नहीं है। मांग जायज है मगर सरकार पूरा नहीं कर पा रही है। ऐसे में जनता सवाल न उठाए, आंदोलन न करे तो फिर क्या करे?
हकीकत यह है कि मामले में एक पेंच है । पेंच यह है कि मुख्यमंत्री ने घोषणा तो कर दी मगर एक शासनादेश के मुताबिक इस सड़क को नियमानुसार डेढ़ लाइन किया ही नहीं जा सकता । दूसरी ओर एक सच्चाई यह भी है कि मुख्यमंत्री की साल 2017 की इस घोषणा पर 2018 में सड़क के डेढ़ लेन चौड़ीकरण के लिए बजट भी जारी कर दिया गया।
विभाग के इंजीनियर स्वीकार कर रहे हैं कि मुख्यमंत्री जी की घोषणा के क्रम में नंदप्रयाग-घाट मोटर मार्ग के 19 किलोमीटर चौड़ीकरण और सुधारीकरण के लिए 1 करोड़ 28 लाख 44 हजार रूपये पहली किश्त के रूप में प्राप्त हुए हैं, जिसमें कि इस मार्ग को डेढ़ लेन अर्थात साढ़े पांच मीटर चौड़ाई में डामरीकृत किया जाना था।
बजट मिलने के बाद विभाग ने मनमाने तरीके से काम भी शुरू कर दिया, मगर क्षेत्र के लोगों के सब्र का बांध उस वक्त टूट गया जब पता चला कि विभाग सड़क को डेढ़ लेने नहीं बना रहा है, बल्कि मनमाने तरीके से बजट ठिकाने लगा रहा है।
काम शुरू करने पर विभाग ने नियम पढ़ाना शुरू कर दिया है कि वर्ष 2018 में जारी उत्तराखंड शासन के एक शासनादेश के बिंदु संख्या 10 के अनुसार यदि मार्ग की पीसीयू 3000 वाहन से अधिक होगी तभी मार्ग को डेढ़ लेन बनाया जा सकता है। विभाग के अनुसार नंदप्रयाग-घाट मोटर मार्ग की पीसीयू 361 वाहन की है इसलिए इस मार्ग को डेढ़ लेन नहीं बनाया जा सकता।
दिलचस्प यह है कि शासनादेश का पाठ पढ़ाने वाले विभाग के अधिकारियों ने खुद से ही यह तय कर लिया था कि 3.75 मीटर को 4.85 मीटर तक चौड़ा कर दिया जाए। बहरहाल विभाग के इस प्रस्ताव पर क्षेत्र के लोग तैयार नहीं हैं। इधर क्षेत्रवासी आंदोलनरत हैं तो काम बंद होने से विभाग के अफसर परेशान हैं।
विभाग के अफसरों की परेशानी जनता की मांग नहीं बल्कि बजट है, पता चला है कि इस मार्ग पर चौड़ीकरण के अलावा नवीनीकरण के लिए ढाई करोड़ रूपए अलग से और भी मंजूर हैं । मतलब बजट की कोई दिक्कत नहीं है यानी विभाग के पास इस मार्ग के लिए चार करोड़ रूपए का बजट है।
अब आते हैं मुददे पर, माना सड़क को डेढ़ लेन किए जाने में कोई शासनादेश आड़े आ रहा है, तो सवाल यह है कि विभाग उस वक्त कहां सोया था जब मुख्यमंत्री इसकी घोषणा कर रहे थे, उस वक्त सिस्टम कहां था जब घोषणा पूरी करने के लिए बजट जारी किया जा रहा था। मान लिया जाए कि किसी शासनादेश में दर्ज मानकों के कारण मुख्यमंत्री की घोषणा पर अमल नहीं हो पा रहा है तो क्या जनहित में सरकार मानक नहीं बदल सकती ? क्या सरकार जनता की मांग पर सड़क को एक लाइन से डेढ़ लाइन करने के मानकों में बदलाव नहीं कर सकती ?
सच तो यह है कि सरकार यह सब कर सकती है, सरकार को यह करने का अधिकार हासिल है। जो सरकार नियम के विपरीत मंजूरियां दे सकती है, न्यायालय के आदेशों की अनदेखी कर सकती है वह सरकार क्या नहीं कर सकती । सरकार चाहती तो जनता की जायज मांग की राह में रोढ़ा बन रहे शासनादेश को निरस्त कर नया शासनादेश जारी कर सकती थी, बशर्ते उसमें इसकी इच्छाशक्ति और जनता के प्रति संवेदनशीलता हो।
सरकारों के लिए यह कोई मुश्किल नहीं है, अक्सर सरकारें ऐसा करती हैं। सरकार अव्यवहारिक नियम कानूनों में संशोधन भी करती और जरूरत पड़ने पर उन्हें निरस्त भी कर सकती है। यही नहीं सरकार को स्थापित मानकों और नियमों में शिथिलता का भी अधिकार है। बीते बीस वर्षों में सरकारों ने इस अधिकार का खूब जमकर इस्तेमाल किया है। पूर्व स्थापित मानक और नियम शिथिल भी हुए तो शासनादेश निरस्त भी किये गए। तमाम नियम कानूनों में भी कई बार संशोधन किए। उल्लेखनीय और गौर करने लायक यह है सरकारों ने आम जनता के लिए शायद ही कभी ऐसा किया हो।
बस यही असल मुददा भी है। समस्या किसी बिल्डर या माफिया की होती, दिक्कत खनन और शराब कारोबारियों की होती, परेशानी किसी उद्योगपति, ठेकेदार या बड़े व्यापारी को होती तो सरकार रातोंरात शासनादेश भी पलटती और राहत देने के लिए नए रास्ते भी तैयार कर डालती ।
मसला नौकरशाहों को फायदा पहुंचाने का होता तो बिना देरी के शासनादेश तैयार कर दिए जाते। यह कोई हवाई बातें नहीं हैं। चलिए एक नजर बीते बीस वर्षों पर डालते हैं । क्या कुछ नहीं किया सरकार ने इनके लिए। बीस वर्षों में बिल्डरों के फायदे के लिए न जाने कितनी बार मानक बदल दिए गए।
राजधानी की घनी आबादी वाले इलाकों में खड़ी बहुमंजिला इमारतें इसका जीता जगता उदाहरण हैं। शिथिलीकरण और संशोधनों के जरिये सरकार की ओर से अस्थाई राजधानी देहरादून में मास्टर प्लान के विपरीत तमाम आवासीय व व्यवसायिक परियोजनाओं के निर्माण को मंजूरी दी गयी। बिल्डरों और उंची पहुंच वालों को फायदा पहुंचाने के लिए मानकों में शिथिलीकरण के अब तक दर्जनों शासनादेश हो चुके हैं।
ऐसे भी उदाहरण हैं कि अवैध निर्माण को वैध करने के लिए सरकार ने मानक तक बदल डाले, देहरादून में मानकों के विपरीत बना मॉल इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। सरकारों ने सिर्फ मानक और नियम ही नहीं बदले कई मौकों पर तो कानून तक बदल डाले। राज्य का भू-कानून जमीन के कारोबारियों के आडे़ आए तो जमीन को भू-कानून से बाहर करने के लिए ग्रामीण इलाकों को शहरी निकायों में शामिल कर दिया । भू-कानून कारोबारियों के आड़े आया तो सीलिंग भी खत्म करने का निर्णय ले लिया। कारोबारियों पर हजारों हेक्टेयर जमीन लुटाने के लिए भी शासनादेश रातोंरात जारी हुए हैं।
क्या क्या गिनाएं, खनन कारोबारियों की कमाई बढ़ाने के लिए नदियों को डेढ़ से तीन मीटर गहरे तक खोदने के लिए नया शासनादेश कर दिया गया। शराब कारोबारियों को दिक्कत हुई तो स्टेट हाइवे को शासनादेश जारी कर डिस्टिक्ट रोड में तब्दील कर दिया गया। और तो और घपले घोटालों और नेता अफसरों के काले कारनामों पर पर्दा डालने के लिए भी वित्तीय नियम और व्यवस्थाएं तक बदली गयीं। नेताओं और अफसरों की महत्वकांक्षाओं और उनके ठाट-बाट के लिए भी कितनी ही बार व्यवस्थाएं बदली जा चुकी हैं। सरकार ने चाहा तो तमाम विरोध और आपत्ति के बावजूद औली के बर्फीले ढलानों पर गुप्ता बंधुओं को विवाह समारोह की इजाजत दे दी गयी।
बात सड़क से शुरू हुई थी तो सड़क की ही बात करते हैं। ऑल वेदर रोड़ सरकार का डीम प्रोजेक्ट है और सरकार की इच्छाशक्ति थी तो तमाम नियमों और मानकों के विपरीत ऑल वेदर रोड तैयार की जा रही है। उच्चतम न्यायालय ने सवाल उठाया और 2018 के मानकों के अनुरूप सड़क निर्माण के आदेश दिए तो सरकार ने आल वेदर रोड पर चल रहे निर्माण के मुताबिक मानक में बदलाव कर दिए।
कहने का मतलब यह है कि सवाल प्राथमिकता और इच्छाशक्ति का है, सवाल मंशा का है। सरकार की मंशा साफ हो तो विभागीय अधिकारी मनमानी करें ऐसा संभव ही नहीं हो सकता। प्राथमिकता में अगर राज्य और जनहित हो तो संभव ही नहीं कि तीन महीने जनता सड़क पर हो और सरकार बेपरवाह बनी रहे। सरकार भले ही न समझ रही हो लेकिन संदेश क्या है ? संदेश साफ है कि जो मुख्यमंत्री जनता की मांग पर एक सड़क को डेढ़ लाइन की नही कर सकते, वह जनता की क्या अपेक्षा पूरी करेंगे ?
अभी तो यह बात नंदप्रयाग-घाट सड़क के चौड़ीकरण की हो रही थी, मगर अब मुख्यमंत्री की जिलों में विकास प्राधिकरण खत्म करने की घोषणा पर भी यही होने जा रहा है। डेढ़ महीने से अधिक वक्त गुजर चुका है मुख्यमंत्री की घोषणा के बावजूद अभी तक शासनादेश नहीं हुआ है। मुख्यमंत्री इस घोषणा पर मालाएं पहन रहे हैं और दूसरी ओर जिलों में घोषणा के बाजूद आम लोगों के नोटिस कट रहे हैं।
फिलहाल मुददे को भटकाने की कोशिश हो रही है। सरकार तो स्वार्थ और सियासत में घिरी ही है , सत्ता के साथ खड़े जनता के चुने प्रतिनिधि भी सरकार के लिए संकट खड़ा कर रहे हैं। अब बताइए कोई जनप्रतिनिधि जनआंदोलन को कैसे खारिज कर सकता है।
कैसे कोई विधायक यह कह सकता है आंदोलन में पत्थरचलाने वालों के खातों में पैसे डाले गए। आखिर क्या कहना चाहते हैं ऐसे माननीय जनप्रतिनिधि ? जाहिर है यह सियासत है मगर वह भूल रहे हैं कि ऐसे ही एक बड़े जनआंदोलन का साइड इफैक्ट है जो वह दो बार के विधायक हैं और अर्से से मंत्री बनने का ख्वाब देख रहे हैं। जनआंदोलन पर प्रतिक्रिया देने वाले यह भी भूल रहे हैं आंदोलन नहीं होता तो कई माननीय मंत्री मुख्यमंत्री तो क्या ग्राम प्रधान या पार्षद तक नहीं होते।
वह यह भी भूल रहे हैं कि सरकारें हाथ पसारने पर हक यूं ही नहीं देती, हक के लिए तो हर दौर में जनता को लड़ना ही पड़ा है, मरना ही पड़ा। और हां जनआंदोलन में अपनी सियासत की संभावनाएं तलाशने वालों को भी यह समझना होगा कि सियासत और आंदोलन दोनों अलग पहलू हैं। दरकार सियासत में आंदोलन की है, आंदोलन में सियासत की नहीं। इसलिए मुददे की गहराई को समझिए, उसे भटकाइए मत…

































