प्रमोद साह
सेना में महिलाओं को बराबरी से स्थाई कमीशन का आदेश जहां एक ओर बहुत प्रगतिशील और स्वागत योग्य निर्णय है वहीं इस निर्णय का दूसरा पहलू बहुत दुखद है. यह दुखद पहलू संविधान में समानता का आधार जोकि लिंग धर्म और जाति के आधार पर किसी भी प्रकार से भेदभाव को वर्जित करता है . यह लोक नियोजन में अवसर की समानता अनुच्छेद 16 मूल अधिकार का उल्लंघन दर्शाता है और बताता है कि कैसे तमाम संवैधानिक दावों के बाद भी देश के महत्वपूर्ण संस्थानों में इस प्रकार की गैर बराबरी की परंपराएं न केवल बनी हुई हैं बल्कि जारी भी हैं .उससे भी दुखद और महत्वपूर्ण यह है कि सेना में अधिकारियों को कमान में अवसर की समानता दिए जाने का दिल्ली उच्च न्यायालय के आदेश का भी 2010 से लंबित रखा जाना है.
इस बराबरी के न्यायिक आदेश के बाद भी सेना के ही महत्वपूर्ण जनरल जैसे पद पर विराजमान व्यक्ति का इस आदेश के लागू नहीं किए जाने के विषय में जो सफाई दी जाती है वह इस देश के संवैधानिक नहीं बल्कि सामंती ढांचे के मजबूत होने की मिसाल है .जो और भी अधिक आपत्तिजनक है .यह सब तब है जब संविधान का अनुच्छेद 16 जो की नियोजन में अवसर की समानता का अधिकार देता है . जिसकी रक्षा की गारंटी अनुच्छेद 32 और 226 में क्रमशः सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय देते है
यूं तो संविधान 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ और पूरे -पूरे 70 वर्षों के बाद इस प्रकार का फैसला सर्वोच्च न्यायालय के द्वारा प्राप्त होना ,जहां एक ओर हमारे न्यायालयों से उम्मीद की परंपरा को बनाए रखता है .वही हमारी संवैधानिक प्रगति पर भी सवाल खड़ा करता है हालांकि हमारी सेना में महिला अधिकारियों का प्रतिशत थल सेना 3.89% ,वायु सेना 6.7 % ,नौसेना13.28 % पहले ही बहुत न्यून है .लेकिन इतने कम प्रतिशत के बाद भी उन्हें अवसरों की समानता से वंचित रखना एक लोकतांत्रिक देश के लिए शुभ नहीं है.
महिलाओं के प्रति बराबरी का विश्व नजरिया : यूं तो जॉन ऑफ आर्क जो 15 वीं सदी में इंग्लैंड से फ्रांस की आजादी की नायिका थी . इससे पहले भारत में रजिया सुल्तान जोधा बाई ,रानी लक्ष्मीबाई जैसे बहुत ही कम नाम महिलाओं के हिस्से में आते हैं इस प्रकार पूरी दुनिया का इतिहास महिलाओं के साथ गैर बराबरी से भरा है लेकिन आधुनिक समय जिसे फ्रांस की क्रांति 1789 के बाद की दुनिया कहा जाता है .वहां भी बहुत चमकदार पन्ने महिला अधिकारो के बराबरी के नही दिखते हैं .
बराबरी का एक महत्वपूर्ण मानक समान मताधिकार है इस दृष्टि से भी तस्वीर बहुत खूबसूरत नहीं है ।बोलशविक (रूसी )क्रांति 1917 के बाद रूस में स्त्री और पुरुषों में समान मताधिकार का अवसर दिया गया .जिसकी देखा देखी 1919 में जर्मनी और इंग्लैंड ने भी इस समान मताधिकार अपनी महिला नागरिकों को प्रदान किया और 1920 में संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा यह कदम उठाया गया .लोकतंत्र के कथित झंडा बरदार इन पश्चिमी देशों में हालांकि बराबर और स्वतंत्र मताधिकार को लेकर कुछ प्रतिबंध उसके बाद भी लगे रहे . इस दृष्टि से भारत की तस्वीर खूबसूरत है यहां आजादी के साथ ही महिलाओं को हर प्रकार की बराबरी का संवैधानिक आश्वासन देने के साथ ही समान मताधिकार भी संविधान द्वारा प्रदत्त किया गया .
महिलाओं के बराबरी का प्रश्न किसी एक देश का सवाल नहीं है .यह एक अंतरराष्ट्रीय प्रश्न है इसके प्रति सजगता बनाए रखने के लिए दुनिया के तमाम देश 8 मार्च को अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस के रूप में मनाते हैं .लेकिन व्यवहार में यह बराबरी पूरी दुनिया में ही गायब दिखती है रोजमर्रा की जिंदगी में महिलाओं को आज भी बराबरी के लिए अपने आप को साबित करने के लिए अतिरिक्त संघर्ष करना पड़ता है . अमेरिका जैसे कथित प्रगतिशील राष्ट्र में वर्ष 2016 से पहले राष्ट्रपति पद की कोई उम्मीदवार न थी वहां पहली महिला राष्ट्रपति प्रत्याशी के रूप में हेनरी क्लिंटन का नाम दर्ज है. वहीं इंग्लैंड में मार्गैट थ्रैचर 1979 प्रधानमंत्री बनी .इस लिहाज से भी भारत की यात्रा और उसका प्रारंभ शानदार है यहां स्वर्गीय इंदिरा गांधी 1966 में महिला प्रधानमंत्री बन गई.
जहां तक सेना और पुलिस जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में महिलाओं की योग्यता और क्षमताओं का सवाल है. वहां मैं अपने निजी सेवा के अनुभव के आधार पर यह कह सकता हूं कि उत्तराखंड में राज्य निर्माण के बाद प्रदेश में 10 पुलिस महानिदेशक हुए हैं उनमें श्रीमती कंचन कंचन चौधरी भट्टाचार्य को यदि सर्वश्रेष्ठ के सवाल में ना उलझाया जाए तो भी उनकी गिनती उत्तराखंड की श्रेष्ठ डीजीपी में होती है . जिन्होंने बहुत जवाबदेही और संवेदनशीलता से अपने कर्तव्य का निर्वहन किया ।
हालांकि सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़ की बैंच ने सेना में महिला अधिकारियों को कमान दिए जाने में समानता के अवसर के मौलिक अधिकार का पालन किए जाने के निर्देश दिए हैं. उम्मीद की जानी चाहिए कि अब इस बराबरी में कोई अड़चन ना होगी लेकिन इस उपलब्धि के बाद भी संविधान के 70 सालों बाद, रुक रुक कर सवालों के घेरे में लाकर दी जा रही .यह बराबरी कहीं ना कहीं समाज में व्याप्त हमारी सामंती मानसिकता की विजय के संकेत देती है ।यह एक दुखद पहलू है
झूठीबराबरी