कार्यालय प्रतिनिधि
Triumphs.. ये उस कुमाऊं रेजिमेंट का आदर्श वाक्य (motto) है जिसका नाम भारतीय सेना के इतिहास के पन्नों में स्वर्णाक्षरों में अंकित है। उच्चतम अलंकरणों से सम्मानित कुमाऊं रेजिमेंट का पहला वृहद इतिहास 1976 में प्रकाशित पुस्तक Valour Triumphs में दर्ज़ है जिसमें रेजिमेंट के जन्म एवं उद्विकास से लेकर 1971 के भारत -पाकिस्तान युद्ध तक की उपलब्धियों का लेखा जोखा है।
परंतु उसके बाद के वर्षों में रेजिमेंट के विकास,विस्तार तथा विविध गतिविधियों पर कोई प्रमाणिक पुस्तक नहीं लिखी गई। गो इस बीच एकाध कॉफी टेबल बुक अवश्य प्रकाशित हुईं।
Valour Triumphs-II इसी उत्तर गाथा की दिशा में एक गंभीर प्रयास है जो ब्रिगेडियर संजय कुमार यादव,VSM, सेंटर कमांडेंट, कुमाऊं रेजिमेंटल सेंटर,रानीखेत एवं प्रोफेसर(सेवानिवृत) अनिल जोशी की दो साल की मेहनत का प्रतिफल है।
सत्रह अध्यायों में विभाजित चार सौ से अधिक पन्नों की यह पुस्तक,जिसका औपचारिक विमोचन कुछ माह पूर्व रानीखेत में हुआ था,पिछले पांच दशकों (1975-2025) में कुमाऊं रेजिमेंट के क्षैतिज विस्तार तथा विविध उपलब्धियों का एक सफ़रनामा है।
इस पुस्तक की प्रमुख विशेषता यह है कि इसमें रेजिमेंट के स्वरूप को कुमाऊं के इतिहास,भौगोलिक विषमताएं,ग्रामीण जीवन,सामाजिक मान्यताएं,धार्मिक आस्थाएं तथा वैविध्यपूर्ण संस्कृति के चश्मे से देखने का प्रयास किया गया है, जो सामान्यतः सैन्य इतिहास पर लिखी गई पुस्तकों में नहीं मिलता।
सैन्य इतिहास पर लिखी पुस्तकों के साथ एक दुश्वारी यह होती है कि ज्यादा फोकस युद्ध संबंधी गतिविधियों तक महदूद रह जाता है जो वृतांत को नीरस तथा बोझिल बना देता है। यह पुस्तक इस मामले में थोड़ा भिन्न है ।
पिछले पांच दशकों में रेजिमेंट की युद्धोत्तर कार्यों में भी महती भूमिका रही है,चाहे वो आंतरिक सुरक्षा का मसला हो अथवा प्राकृतिक आपदा में राहत कार्य ।
हाल के वर्षों में नई चुनौतियों के आलोक में सेना के संख्या बल में भी वृद्धि हुई है,जिससे प्रत्येक रेजिमेंट प्रभावित रही है।इसी कड़ी में कुमाऊं रेजिमेंट तथा नागा रेजिमेंट,जो फिलहाल कुमाऊं रेजिमेंट का ही एक अभिन्न अंग है,की बटालियनों में वृद्धि हुई है।
इसके अलावा कश्मीर घाटी में आतंकवाद से निबटने हेतु बनी राष्ट्रीय राइफल्स,पर्यावरण सरंक्षण को प्रतिबद्ध इको बटालियन,पूर्वी कुमाऊं में चीन से लगी सीमा की निगेहबानी करती कुमाऊं स्काउट्स,ये सभी विगत पचास वर्षों का विस्तार हैं।
इस दौरान कुमाऊं रेजिमेंट के सैनिकों ने लद्दाख से लेकर अंडमान निकोबार तक अपनी सेवाएं दी हैं,जिसमें कारगिल युद्ध में बलिदानों की गाथा सर्वोपरि है।
ऑपरेशन मेघदूत के तहत सियाचिन में फतह हासिल करने वाली भारतीय सेना की पहली टुकड़ी कुमाऊं रेजिमेंट की ही थी। पूर्वोत्तर के राज्यों में राष्ट्रविरोधी तत्वों के विरुद्ध चले ऑपरेशन बजरंग व ऑपरेशन राइनो में कुमाऊनी सैनिकों की सक्रिय भूमिका रही है।
इस कालखंड में रेजिमेंट ने कुछ अति संवेदनशील अभियानों में भी सराहनीय कार्य किया।
विशेषकर 1984 में ऑपरेशन ब्लूस्टार,जहां पवित्र स्वर्ण मंदिर के प्रांगण से अतिवादियों को निकालने की कार्यवाही में साहस से अधिक चतुराई और संयम से काम लेना आवश्यक था और जिस कार्य में एक अधिकारी को मरणोपरांत महावीर चक्र प्राप्त हुआ।
संयुक्त राष्ट्र शांति सेना के विभिन्न अभियानों में कुमाऊं रेजिमेंट की बटालियनों ने अंगोला,कांगो, सोमालिया,इरीट्रिया,लेबनान में शांति स्थापना तथा पुनर्वास प्रक्रिया में योगदान दिया है।
अनेक गैर सैनिक अभियानों में भी रेजिमेंट के प्रयासों को सराहा गया,जैसे उत्तरकाशी में भूकंप,मालपा की त्रासदी,पंजाब में बाढ़,अमरनाथ धाम में यात्रा व्यवस्था ।
इन सभी गतिविधियों का विस्तृत विवरण है इस पुस्तक में।
एक अध्याय क्रीड़ा के क्षेत्र में उपलब्धियों को समर्पित है।
सेना में खेल कूद अनिवार्य गतिविधि होती है,शारीरिक पुष्टता और मनोरंजन, दोनों दृष्टि से। कुमाऊं रेजिमेंट के जवानों ने एथलेटिक्स,बॉक्सिंग,तीरंदाजी, ताईक्वांडो आदि में राष्ट्रीय एवं ओलिंपिक जैसी अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में सफलता हासिल की है ।
साहसिक अभियानों जैसे पर्वतारोहण, रिवर राफ्टिंग,कार रैली,मोटरसाइकिल रैली आदि में भी प्रदर्शन उल्लेखनीय रहा है ।
प्रत्येक अध्याय के अंत में चित्रों का संकलन है जो आलेख को जीवंत बनाता है। समय समय पर रेजिमेंट के सैनिकों की पोशाकों में जो जो परिवर्तन हुए उनके भी चित्र हैं।
एक पहलू, जो सामान्यतः अनछुआ रह जाता है,वो है सेना द्वारा सैनिकों तथा उनके परिवारों के हित में निरंतर किए जाने वाले कल्याणकारी कार्य। पुस्तक में ऐसी सभी योजनाओं/कार्यकलापों का विवरण है ।
पुस्तक के अंत में परिशिष्ट सर्वाधिक सूचनाप्रद है जिसमें कुमाऊं रेजिमेंट के प्रारंभ से लेकर आज तक के समस्त कमांडेंटों,कमांडिंग अफसरों तथा सूबेदार मेजरों की क्रमबद्ध सूची है तथा रेजिमेंट को अभी तक मिले सभी पुरस्कारों ,सम्मानों एवं अलंकरणों का सम्पूर्ण ब्यौरा है।
कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि यह पुस्तक सैन्य इतिहास में रुचि रखने वालों के लिए उपयोगी सिद्ध होगी। कुमाऊं क्षेत्र के निवासियों के लिए अपनी सैन्य धरोहर से रूबरू होने का एक महत्वपूर्ण ज़रिया बनेगी तथा सेना में सेवाएं देने को इच्छुक इस क्षेत्र के युवाओं के लिए प्रेरणा श्रोत ।
Valour Triumphs-II:
A Modern History of Kumaon and Naga Regiment
प्रकाशक : कुमाऊं रेजिमेंटल सेंटर, रानीखेत































