चन्द्रशेखर जोशी
खूबसूरत सपने बर्बादी का कारण बनेंगे। सरकार की योजना पक्की है। गांव वालों को नासमझ कहने वालों ने अब खुद उद्यमी बनने की ठानी है।
…अधेड़ शहरों से बचत लेकर पहुंचे हैं, युवाओं की नजर बाप के पैसे पर टिकी है। घरों में रात-दिन व्यवसाय की चर्चा है। दिमाग में उमड़-घुमड़ कर विभागों की योजनाएं गूंजती हैं। सपने बैंक के सस्ते लोन पर सजे हैं।
…1990-92 के बीच एक एनजीओ ने उत्तराखंड के पहाड़ों में खूबसूरत लिलियम फूल उगाया। कुछ किसानों ने बड़ी मिन्नतें कर फूल के कंद मांग लिए। यह फूल घरों के पास क्यारियों की शोभा बढ़ाने लगा। एनजीओ ने फूल बेचकर धन कमाया और फाइलें बना कर सरकार से मोटी रकम वसूली। इसके बाद एनजीओ गायब हो गया।
…कुछ सालों पहले एक एनजीओ फिर फूल और फाइलें लेकर गांवों में आया। मोटी कमाई की बात सुन गांव वाले लिली हो उठे। एनजीओ ने सरकार के सामने प्रोजेक्ट पेश किया। गांव वालों को फूल के कंद बेचे। जलागम और ग्राम्या संस्था ने पहाड़ के दर्जनों गांवों में फूल उगाए। एक साल किसानों को फूल बेचने के एवज में पैसा मिला। इसके बाद आसपास के गांव वालों में भी धान-गेहूं, सब्जी छोड़ लिलियम उगाना शुरू कर दिया। जब उपज बढ़ी तो एनजाओ ने बाद में धन देने का वादा कर फूल ले लिए। संगठन कारोबार समेट चलते बने, करीब पांच साल से किसानों को फूल के रुपए नहीं मिले। लिली के पौधे ठूंठ बन गए, एक साल बाद खेत बंजर हो गए। फूलों का कारोबार बड़े फार्म हाउसों से चलने लगा।
…बड़ा आदमी बनने का धंधा होटल व्यवसाय में खूब फला। कुछ युवाओं ने भी इस धंधे में हाथ आजमाए। वीरचंद्र सिंह गढ़वाली सरीखी योजना में कुछों ने लीज एग्रीमेंट किए, कुछ अपनी जमीन पर भवन बना बैठे। पर्यटन नगरों के अलावा कहीं भी ये होटल फलीभूत न हुए। कर्ज की किस्तें चुकाने में फर्नीचर, बर्तन समेत घर की संपत्ति भी बिक गई।
…कमजोर घरों के युवाओं ने टैक्सी वाहन खरीद जीवन चलाने का प्रयास किया। इस काम में तुरंत रुपए आने लगे। सालभर तक बैंकों की किस्तें गईं। दिन-रात दौड़ते अधिकतर युवक शराबबाजी में पड़ गए। जब वाहन के मेंटिनेंस के खर्चे बढ़ने लगे तो किस्त चुकाना दूभर हो गया। इस धंधे से जुड़े 25-30 साल के युवक 50 की उम्र के लगते हैं। कई युवा गंभीर बीमारियों से घिर चुके।
…दुकानों में इतनी प्रतियोगिता है कि उपकरण, निर्माण सामग्री, परचून, रेडीमेड कपड़ों की दुकानें गर अपनी हैं तो घर का खर्च निकलता है, किराए वाली दुकानें बंद होने के कगार पर हैं। रोजगार के लिए बैंकों की सूदखोरी में फंसने वाले युवा जल्द अवसाद में जाएंगे। मेहनती गरीब घरों के युवक खेती, दिहाड़ी-मजूरी कर जीवन चलाते रहेंगे।
…धनवानों ने कमाई वाले कोई कारोबार गरीबों के लिए नहीं छोड़े हैं। रोजगार देना सरकार की जिम्मेदारी है, पर सरकार ने बैंकर्स की दुकानों में युवाओं के खून का कतरा-कतरा जमा करने की योजना बना दी है।
..स्वप्निल उद्यमी सुशांत सिंह बनने की न ठानें, धैर्य रख सरकार से अपना हक मांगें.