राजशेखर पंत
अंग्रेज़ी कवि विलियम ब्लेक की कविताओं का प्रमुख आकर्षण उसका बच्चों वाला वह अंदाज़ है जिससे वह दुनिया को देखता है; ‘अ सेंस ऑफ चाइल्डलाइक वंडर’ कहते हैं जिसे। जिज्ञासा, कौतूहल और भोलेपन के इस मिलेजुले अंदाज़ से इस दुनियां की विविधता को देखना और महसूस करना निश्चित ही एक नायाब अनुभव होता है। उम्र के साथ समझदारी हमारा दामन खींचने लगती है और इसके साथ ही बदलने लगता है देखने और अनुभव करने का अंदाज़। अभिव्यक्ति के विभिन्न स्वरूपों जैसे आश्चर्य, भय, उत्साह इत्यादि को भी हम नियंत्रित करना सीख जाते हैं और जिज्ञासा, कौतूहल जैसी सहज अभिव्यक्ति सामाजिक दबावों और वर्जनाओं के बोझ तले कहीं दब जाती है।
दुनियां को देखने का अंदाज ही शायद हमारे सपनों, हमारे आदर्शों को गढ़ता है। जाहिर है बचपन में जब हमारी सोच एक सेंस ऑफ चाइल्डलाइक वंडर कंडिशन करता है तो सपनों का कोई ओर छोर नहीं होता, किसी तरह की लय नहीं होती है इनमें। आसमान में उड़ते परिंदे से लेकर मस्त गीत गाते हुए ट्रक ड्राइवर तक कुछ भी हमारा सपना, हमारा आदर्श हो सकता है। युवावस्था में रूमानियत और किताबी कहे जाने वाले आदर्श हमारे सपने गढ़ते हैं। इन सपनों का पूरा होना या अधूरा रह जाना एक दीगर बात है, पर इस हक़ीक़त को अनदेखा नहीं किया जा सकता कि ये आम ज़िंदगी का एक अहम हिस्सा होते हैं।
पर मैं आम आदमी की बात भला क्योँ कर रहा हूँ? आज के समय में, जब अतीत की शल्यक्रिया, इतिहास का जीर्णोद्धार और भूत हो चुके सुनहरे युग की शव-साधना लगातार जिम ज्वाइन कर बनाये गये गठीले शरीर वाले राष्ट्रवाद की उंगली थामे टहलने लगी हों, तब आम आदमी की क्या बिसात कि वह अपनी गली में भी आत्मविश्वास के साथ बेधड़क चल सके। वी आइ पीज़ के लिए रास्ता न छोड़े जाने पर व्यवस्था के नुमाइंदों द्वारा हाशिये पर धकेला जाना तो अब तक हमारी आदत में शुमार हो चुका है। कुछ और बात करते हैं…
पहाड़ी रास्ते पर मेरी गाड़ी के आगे चल रही पिक-अप मुझे पास नहीं दे पा रही है। मेरी निगाहें उसके पिछले हिस्से पर लिखी पंक्ति पर टिकी हैं-
‘बड़ा होकर ट्रक बनूंगा।’
हो सकता है पर्याप्त साधनों की अनुपलब्धता के चलते पिक-अप के मालिक को, जो शायद ट्रक खरीदना चाह रहा होगा, मजबूरन इस पिक-अप से ही संतोष करना पड़ रहा हो। मजेदार बात यह है कि उसने अपने सपने को एक इबारत की शक्ल में गाड़ी के पिछवाड़े पर चस्पा कर दिया है। कौन जाने यह छोटी सी पिक-अप आने वाले वक्त में उसके लिए एक ट्रक का जुगाड़ कर दे…खैर…
एक मोड़ के बाद आये सड़क के चौड़े किनारे पर बड़े होकर ट्रक बनने वाली यह पिक-अप मुझे पास दे देती है।
गाड़ी के रफ्तार पकड़ने के साथ ही मेरा मन हमेशा के तरह बेलगाम होने लगता है। भला क्या रहते होंगे हमारे कथित नेताओं और राजनीतिज्ञों (राजनीतिबाजों??) के सपने? पैदल के बाद साइकिल और फिर बरास्ता पिक-अप ट्रक बनने वाले नेता/ राजनीतिबाजों के अलावा सीधे ट्रक के रूप में अवतरित होकर फाइटर जैट और मिसाइल बन जाने वालों की अच्छी भली जमात आजकल बग़ैर ढूंढे मिल जाती है। मेरे कुछ विश्वविद्यालयी साथी -जिनकी उस दौर में कुल जमा उपलब्धि परिसर में मार-पीट, प्रोफेसर्स को गरियाना, वीसी का घेराव या फिर छात्रसंघ के चुनावों में छुटभइयों वाला रोल हुआ करता था- अपने अपने गावों की प्रधानी के बाद विधायक वगैरा बन कर इस फानी दुनियां से जल्दबाजी में रुख़सत भी हो चुके हैं; बेशक खुद एक सनसनीखेज दास्तान का अहम क़िरदार होने के चलते उनके लिए अगली पीढ़ी को सीधे फाइटर जैट बनने का सपना विरासत में बख्शना खासा आसान रहा था।
मुझे वाक़ई नहीं मालूम कि संसद, सांसद और सपनों का कोई आपसी रिश्ता है भी या नहीं। हाँ, यह निश्चित ही सच है कि संसद में घुस आये ज्यादातर सांसदों के सपने बड़े विस्फोटक होते हैं। कभी अब संविधान-सदन बन चुकी संसद में बैठ कर गरीबी, गुरबत और गुलामी से उबर रहे देश को मज़बूत, आत्मनिर्भर और एक आदर्श राष्ट्र बनाने के सपने देखे-दिखाये गए होंगे। जैसा कि अक्सर होता है, कुछ सपने टूटे होंगे, कुछ अधूरे रहे होंगे, कुछ भटक गये होंगे, लानतें-मलामतें भी हुई होंगी। वो ज़माना शायद ट्रक बनने का सपना संजोने वाली पिक-अप का था। बेशक़ यह ट्रांजिशन धीमा रहा होगा। यूं भी पिक-अप में ट्रक जैसी आक्रामकता आने में वक्त तो लगता ही है। पर एक बार ट्रक बन गये तो सपनों की अगली उड़ान आसान हो जाती होगी।
गनीमत है कि इस दुनियां-जहान को बनाने वाले ने कुर्सियों को याददाश्त नहीं अता फरमाई, वरना संविधान-सदन बन चुकी पुरानी संसद में पसरी खामोशी गुजरे ज़माने की बेशुमार रंगीन यादों में कहीं खो जाती। यह भी अच्छी बात है कि संसद की कार्यवाही के अनचाहे हिस्सों को रिकार्ड से बाहर कर देने का प्रावधान भी तब ही बना दिया गया था जब यहां सिर्फ पिक-अप हुआ करती थीं और ट्रक बनने के सपने इतने आम नहीं थे।
नया संसदभवन काफी बड़ा है। बेशुमार ट्रकों के साथ कई फाइटर हवाई जहाजों और मिसाइलों के लिए भी खासी जगह मौज़ूद है यहां। और सबसे अच्छी बात तो यह है कि नए संसदभवन के उद्घाटन के साथ ही उसमें सम्पन्न होने वाली कार्यवाही का रंगीन टीजर भी बाकायदा रिलीज हो चुका है।
मेरी गाड़ी अब अपनी मंज़िल पर पहुंचने वाली है। दिन भर इधर-उधर दौड़ते हुए जिस-तिस पर भोंक कर अपनी बेचैनी का इज़हार करने के बाद, आवारा कहे जाने वाले बगैर पट्टे के कुत्ते, गेट की दीवार से पीठ टिकाये सो रहे हैं। मेरे अंदर का आम आदमी मुझसे फुसफुसाते हुए कहता है “पूंजीवादी सिर्फ व्यवस्था ही नहीं होती, मानसिकता भी होती है। सफल वही है जिसे बिकना और बेचना दोनों आते हैं। रही बात हमारे जैसे आम आदमी की तो वह तो दशकों पहले ही ‘आगामी अतीत’ का एक किरदार भर बन चुका है।”
रात तो वक्त की पाबंद है ढल जाएगी,
देखना ये है चराग़ों का सफ़र कितना है।