मुकेश सेमवाल
बीते महीने 7 फरवरी को चमोली जिले के रैणी तपोवन क्षेत्र में हुई त्रासदी के एक महीना पूरा होने पर आज देहरादून में एक परिचर्चा का आयोजन किया गया। इस परिचर्चा में भूगर्भ विज्ञानी डॉक्टर एसपी सती ने आपदा के कारणों तथा प्रभाव को लेकर वक्तव्य दिया। डॉक्टर सती ने हिमालय के संवेदनशील क्षेत्र में जल विद्युत परियोजनाओं के निर्माण को विनाश का आमंत्रण बताते हुए कहा कि रैणी में हुई त्रासदी इसका ताजा प्रमाण है। उन्होंने कहा कि यदि प्रभावित क्षेत्र में बिजली परियोजना नहीं होती तो जलजला आने के बाद भी इतनी बड़ी संख्या में बेकसूर लोगों की जान नहीं जाती। उन्होंने कहा कि जल विद्युत परियोजनाओं के निर्माण में हिमायल की संवेदनशीलता और पर्यावरणीय मानकों का उल्लंघन चिंता का विषय है और आम जनता को इस दिशा में जागरुक करने की जरूरत है। डॉक्टर सती के अलावा वरिष्ठ पत्रकार शंकर सिंह भाटिया ने भी तपोवन आपदा को लेकर विचार रखे। उन्होंने कहा कि आपदा में मारे गए स्थानीय लोगों के परिजनों को दिए जाने वाला मुवावजा बेहद कम है जिसे बढ़ाया जाना चाहिए।
परिचर्चा के बाद उत्तराखंड के जल, जंगल और जमीन से जुड़े सवालों को आवाज देने के लिए एक 15 सदस्सीय कमेटी ‘हिमालय बचाओ जन समिति’ का गठन किया गया। प्रख्यात लोकगायक नरेंद्र सिंह नेगी तथा वरिष्ठ पत्रकार राजीवलोचन साह इस समिति के संरक्षक बनाए गए हैं। डॉक्टर एसपी सती, डॉक्टर नवीन जुयाल तथा तीन वरिष्ठ पत्रकारों चारु तिवारी, शंकर सिंह भाटिया तथा योगेश भट्ट को सलाहकार बनाया गया है। समिति का संयोजक डॉक्टर मुकेश सेमवाल को बनाया गया है। समिति जल्द ही आपदा प्रभावित रैणी तपोवन का दौरा करेगी। इस दौरान बड़े बांधों से होने वाले खतरों के खिलाफ एक प्रस्ताव भी पारित किया गया।
प्रस्ताव के प्रमुख बिंदु इस प्रकार हैं।
– उत्तराखंड में बड़ी संख्या में बन रही जल विद्युत परियोजनाओं की समीक्षा की जाए।
– सभी जल विद्युत परियोजनाओं के संबंध में पर्यावरणीय नुकसान का अध्ययन कर खतरनाक परियोजनाओं को तत्काल बंद किया जाए।
– सुप्रीम कोर्ट द्वारा वर्ष 2013 की केदारनाथ आपदा में बांधों से हुए नुकसान का अध्ययन करने के लिए बनाई गई रवि चोपड़ा कमेटी की रिपोर्ट और सुझावों के साथ ही समय-समय पर तमाम वैज्ञानिकों द्वारा दिए गए सुझावों को तत्काल अमल में लाया जाए।
– तपोवन आपदा मारे गए स्थानीय लोगों के परिजनों को दिए जाने वाले मुवावजे कतो बढ़ा जाए।