राजीव लोचन साह
यह अजीब लग सकता है, लेकिन है सच कि चमोली जिले में हुई भीषण दुर्घटना से उत्तराखंड को भली भाँति जानने वाले किसी भी व्यक्ति को हैरानी नहीं हुई। अफसोस हुआ मगर हैरानी नहीं। यह दुर्घटना तो होनी ही थी। इसकी पटकथा उत्तराखंड राज्य बनने से भी पहले से लिखी जा रही थी। वैज्ञानिक सावधान करते रहे, जनता सड़कों पर और अदालतों में लड़ती रही, मगर सरकारों, चाहे वे कांग्रेस की हों या भाजपा की, के कान में जूँ नहीं रेंगी। यहाँ तक कि 2013 की केदारनाथ आपदा के बाद भी सरकारों के सोच में कोई बदलाव नहीं आया। अब पचास से ज्यादा शव निकल चुके हैं और इसके लगभग तीन गुना लापता हैं। हम अपनी संवेदना ही व्यक्त कर सकते हैं और उत्तराखंड के हितैषियों से निवेदन करते हैं कि जल विद्युत परियोजनाओं और प्रदेश में चल रहे विकास के मौजूदा मॉडल के खिलाफ नये सिरे से एकजुट हों, ताकि ऐसे दिन फिर देखने को न मिलें। इन जल विद्युत परियोजनाओं के अतिरिक्त एक बड़ा खतरा तो फिलहाल ऑल वेदर रोड का है, जिसका निर्माण वैज्ञानिकों की सहमति और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित समिति की संस्तुतियों के आधार पर ही होना चाहिये। अन्यथा कुछ वर्षों बाद हम आज की ही तरह फिर विलाप कर रहे होंगे। अफसोस कि सरकार ऑल वेदर रोड के बारे में भी अपने अड़ियल रवैये में बदलाव नहीं कर रही है।
दिल्ली की सीमा पर चल रहे ऐतिहासिक किसान आन्दोलन को अस्सी दिन से ज्यादा हो गये हैं। लेकिन कोई नतीजा निकलता नहीं दिखाई दे रहा है। न सरकार तीन कृषि कानून वापस लेने को तैयार है और न किसान बगैर ये कानून वापस करवाये घर लौटन को तैयार हैं। लालकिले में हुई हिंसा के बाद एक बार सरकार ने किसानों की घेरेबन्दी कर ली थी, मगर गाजीपुर बॉर्डर पर किसान नेता राकेश टिकैत के भावुक हो जाने से हालात बदल गये। न सिर्फ आन्दोलनकारी किसानों में नया जोश जग गया, बल्कि जो आन्दोलन पहले सिर्फ पंजाब और हरियाणा के किसानों का बतलाया जा रहा था, वह जगह-जगह होने वाली किसान महापंचायतों के जरिये पश्चिमी उत्तर प्रदेश और राजस्थान में भी व्यापक रूप से फैल गया। महापंचायतों के अतिरिक्त किसान छोटे-छोटे कार्यक्रमों के जरिये भी जनचेतना फैलाने के प्रयोग कर रहे हैं। पहले उन्होंने पूरे देश में तीन घंटे का चक्का जाम किया। फिर पुलवामा में दो वर्ष पूर्व शहीद हुए सैनिकों के साथ मौजूदा आन्दोलन में शहीद हुए किसानों को श्रद्धांजलि देने का कार्यक्रम रखा और अब 18 फरवरी को पूरे देश में रेल रोकने का आह्वान किया है। मगर सच्चाई यह भी है कि आजादी के बाद के इस सबसे बड़े जनान्दोलन में अब एकरसता सी आने लगी है।
भारत सरकार ने आन्दोलन को तोड़ने की जितनी भी कोशिशें कीं, वे सब उल्टी पड़ीं। गणतंत्र दिवस को हुई हिंसा का कुहासा छँटने के बाद अब यह बात साफ हो गई है कि उस रोज दिल्ली पुलिस ने सुनियोजित ढंग से ट्रैक्टरों को गलत रास्ते पर डाला था, ताकि कहीं कुछ गड़बड़ हो और उसे आन्दोलनकारियों को कटघरे में खड़ा करने का मौका मिले। यह सवाल भी अपनी जगह बरकरार है कि लालकिले में सुरक्षा व्यवस्था उस दिन क्यों इतनी ढीली-ढाली थी ? क्यों लालकिले के भीतर जाना इतना आसान हो गया ?
लालकिले की घटना के बाद सरकार द्वारा उठाये सभी कदम हास्यास्पद रहे और उसकी बौखलाहट को जाहिर करने लगे। इस अवांछित घटना के बाद पुलिस ने किसान नेताओं को अपराधी मानते हुए उनके खिलाफ ‘लुक आऊट’ नोटिस जारी कर दिये। जब ये नेता आन्दोलन स्थल को छोड़ कर कहीं गये ही नहीं थे तो लुक आऊट नोटिस की क्या तुक थी ? फिर गाजीपुर बॉर्डर पर पुलिस ने फ्लैग मार्च कर आन्दोलनकारियों को उठाने की कोशिश की तो उसे मुँह की खानी पड़ी। उसके बाद पुलिस ने सड़क पर कीलें गाड़ीं और दीवारें खड़ी कीं और कीलों के बदले किसानों ने वहाँ पर फूलों के पौधे रोप दिये तो विदेशों से विरोध की आवाजें उठने लगीं। रिहाना, ग्रेटा थुनबर्ग, मीना हैरिस, मिया खलीफा आदि शख्सियतों ने इस दमनात्मक कार्यवाही का विरोध किया तो भारत सरकार द्वारा अपने पक्ष में देश के मशहूर फिल्मी सितारों और खिलाड़ियों को उतारने का नाटक करना पड़ा। मगर कौन सा काम स्वेच्छा से किया जा रहा है और कौन सा दबाव में करवाया जा रहा है, इसे समझने में बहुत दिमाग तो नहीं लगाना पड़ता! अब ‘टूल किट’ का शोर पैदा कर दिशा रवि नामक एक 21 वर्ष की युवती को राजद्रोह के आरोप में जेल में डाल दिया गया है। यह टूल किट क्या है ? मीडिया में हो रहे हो हल्ले से लग रहा है मानो यह नये किस्म का कोई आणविक हथियार हो, जिसकी मदद से सरकार गिराने का षड़यंत्र रचा जा रहा हो। लेकिन संक्षेप में समझा जाये तो जैसे बीते समय में अपने आन्दोलन को आगे बढ़ाने के लिये पर्चेबाजी की जाती थी, उसी तरह अब सोशल मीडिया में उभार पैदा करने का यह एक तरीका है कि कैसे ज्यादा से ज्यादा लोगों को आन्दोलन से जोड़ा जाये और उन्हें बतलाया जाये कि उन्हें क्या करना है। सोशल मीडिया का सुनियोजित इस्तेमाल कर भारतीय जनता पार्टी सत्ता में आयी थी, मगर अब वहीं तरीके उसकी सरकार के विरोध में इस्तेमाल होने लगे हैं तो वह दमन पर उतर आयी है। जिस ट्विटर का पूरा इस्तेमाल उसने किया है, अब उसके साथ भी उसकी ठन गई है। अंग्रेजी राज की गुलामी से लेकर आजादी के बाद के कांग्रेस शासन तक देश की जनता ने कई तरह के दमन झेले हैं। मगर मौजूदा शासन में दमन के नये-नये तरीके खोजे जा रहे हैं।
कहने को किसान आन्दोलन के बारे में संसद के बजट सत्र में अच्छी बहस हुई। सत्ताधारी दल के पास अपने बचाव में यह कहने के अतिरिक्त कुछ था ही नहीं कि कोई यह बता ही नहीं रहा है कि इन कानूनों में काला क्या है। हालाँकि विपक्षी दलों के वक्ताओं ने इस बात को बार-बार और दमदार ढंग से स्पष्ट किया था, खास कर मुख्यधारा के मीडिया द्वारा जनता की नजर में लल्लू बना दिये गये कांग्रेस के राहुल गांधी ने। प्रधानमंत्री अपने मनमोहक ड्रामाई अंदाज में किसान आन्दोलन को समर्थन देने वालों को ‘आन्दोलनजीवी’ कह कर उन्हें हेय बताने की कोशिश करने से ज्यादा कुछ नहीं कर पाये। हालाँकि इस पर उनकी खिल्ली भी खूब उड़ी और उन्हें ‘कॉरपोरटजीवी’ कहा जाने लगा।
विश्व का सबसे बड़ा गणतंत्र होने के नाते भारत में चल रहे किसान आन्दोलन को लेकर विदेशों में भी चिन्ता है। अमेरिका में बाइडन की नयी डेमोक्रेटिक सरकार द्वारा भारत में अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर चिन्ता जताई गई है, मगर साथ-साथ नये कृषि कानूनों को समर्थन भी दिया गया है। इसमें कोई हैरानी नहीं होनी चाहिये, क्योंकि ऐसे कानून विकसित देशों के दबाव में ही बनाये जा रहे हैं, ताकि उन्हें भारत के विशाल कृषि बाजार में अपना हिस्सा मिले। इस साल के बजट में पूरी तरह स्वस्थ भारतीय जीवन बीमा निगम को बेचने के प्रस्ताव से ही जाहिर है कि मौजूदा सरकार देशी-विदेशी कॉरपोरेटों के हित साधने के लिये कितनी दूर तक जा सकती है। बाकी अमेरिका की जनता किसान आन्दोलन को लेकर क्या सोचती है, यह वहाँ की उप राष्ट्रपति कमला हैरिस की भांजी मीना हैरिस के बयान से स्प्ष्ट है। ऐसे दुनिया के कई देशों में हो रहा है। मगर भारत सरकार विदेशों में अपनी डूबती हुई साख को बचाने का जतन करने के बदले इसे देश के खिलाफ एक अन्तर्राष्ट्रीय साजिश सिद्ध करने पर तुली है। यहाँ एक बार फिर यह बता देना प्रासंगिक होगा कि मुख्यधारा का भारतीय मीडिया, जिसे सरकार समर्थक होने के कारण अब बहुत सारे लोग ‘गोदी मीडिया’ कहने लगे हैं, वह सरकार की साख बचाने में जुटा हुआ है, अन्यथा देश की भी अधिसंख्य जनता का मौजूदा सरकार से मोहभंग हो चुका होता।
बहरहाल, बहुत नुकसान हो चुका है और अब भारत का हर शान्तिकामी नागरिक दिल से चाहता है कि किसान आन्दोलन ने एक इतिहास रच दिया है, मगर अब इसका एक सम्मानजनक समाधान निकलना चाहिये।
इस रात की सुबह होनी चाहिये।
राजीव लोचन साह 15 अगस्त 1977 को हरीश पन्त और पवन राकेश के साथ ‘नैनीताल समाचार’ का प्रकाशन शुरू करने के बाद 42 साल से अनवरत् उसका सम्पादन कर रहे हैं। इतने ही लम्बे समय से उत्तराखंड के जनान्दोलनों में भी सक्रिय हैं।