चारु तिवारी
बहुत विचलित करने वाली खबर आ रही है। हमारे अग्रज, प्रिय कवि, जनसरोकारों के लिये प्रतिबद्ध मंगलेश डबराल जी जिंदगी की जंग हार गये हैं। पिछले दिनों वे बीमार हुये तो लगातार हालत बिगड़ती गई। बीच में थोड़ा उम्मीद बढ़ी थी लेकिन आज ऐसी खबर मिली जिसे हम सुनना नहीं चाहते। मंगलेश डबराल जी को विनम्र श्रद्धांजलि।
यह 1998 की बात है। वे मुझे अचानक भरी बस में मिल गये। नोएडा से दिल्ली आते वक्त। उन दिनों शाहदरा से नोएडा के लिये एक बस लगती थी। इसे शायद एक नंबर बस कहते थे। यह हमेशा खचाखच भरी रहती थी। पांव रखने की जगह नहीं होती। शाम के समय तो बिल्कुल नहीं। मैं जहां से बस लगती थी, वहीं से बैठ गया था। दो-तीन स्टाॅप के बाद वो भी बस में चढ़े। मेरी सीट के बगल में लोगों से पिसकर खड़े हो गये। कंधे में हमेशा की तरह झोला लटकाये। मैं खड़ा हो गया। उन्हें बैठने कोे कहा। पहले वे ना-ना करते रहे। बोले, मुझे यहीं जाना है मयूर विहार तक। मैंने कहा, ठीक है सर! आप बैठिये तो। वे मेरा आग्रह टाल नहीं पाये। मैंने बताया कि मैं उन्हें जानता हूं। मुरादाबाद से। बोले कभी आना यहीं तो है आजकल मेरा आॅफिस सेक्टर- 6 में। ‘जनसत्ता’ का। मंगलेश जी (मंगलेश डबराल) को जानना कविता की एक ऐसी धारा के साथ चलना है, जिसमें आमजन की संवेदनाओं की गूंज बहुत गहरे तक होती है। उनसे बातचीत और मुलाकात का सिलसिला तो नब्बे के दशक से था, लेकिन बहुत नजदीक से मिलना दिल्ली आने के बाद ही हुआ। इसके बाद मंगलेश डबराल जी से लगातार मिलना रहा।
मंगलेश डबराल के अंतिम शब्द जो उन्होंने अस्पताल से लिखे
बुखार की दुनिया भी बहुत अजीब है. वह यथार्थ से शुरू होती है और सीधे स्वप्न में चली जाती है. वह आपको इस तरह झपोडती है जैसे एक तीखी-तेज़ हवा आहिस्ते से पतझड़ में पेड़ के पत्तों को गिरा रही हो: वह पत्ते गिराती है और उनके गिरने का पता नहीं चलता. जब भी बुखार आता है, मैं अपने बचपन में चला जाता हूँ. हर बदलते मौसम के साथ बुखार भी बदलता था: बारिश है तो बुखार आ जाता था, धूप अपने साथ देह के बढे हुए तापमान को ले आती और जब बर्फ गिरती तो माँ के मुंह से यह ज़रूर निकलता, ‘अरे भाई, बर्फ गिरने लगी है , अब इसे ज़रूर बुखार आएगा.’ एक बार सर्दियों में मेरा बुखार इतना तेज़ हो गया कि पड़ोस की एक चाची ने कहा, ‘अरे च्छोरा, तेरा बदन तो इतना गर्म है कि मैं उस पर रोटी सेंक लूं!’ चाची को सुनकर लोग हंस देते और मेरा बुखार भी हल्का होने लगता. उधर, मेरे पिता मुझे अपनी बनायी बुखार की कारगर दवा ज्वरांकुश देते जिसका कडवापन लगभग असह्य था. वह गिलोय की गोली थी., लेकिन पता नहीं क्या-क्या पुट देकर इस तरह बनाई जाती थी कि और भी ज़हर बन जाती और बुखार उसके आगे टिक नहीं पाता था. एक बार गांव में बुखार लगभग महामारी की तरह फैलने लगा तो पिता ने मरीजों को ज्वरांकुश देकर ही उसे पराजित किया. अपनी ज्वरांकुश और हाजमा चूर्ण पर उन्हें बहुत नाज़ था जिसकी परंपरा मेरे दादाजी या उनसे भी पहले से चली आती थी. पिता कहते थे कि जडी-बूटियों को घोटते वक़्त असल चीज़ यह है कि उन्हें कौन सा पुट –दूध, शहद, घी, अदरक, पारा, चांदी , सोने का–दिया जाता है. उसके अनुसार उसकी तासीर और इस्तेमाल बदल जाते हैं. बहरहाल, जब मेरा बुखार उतरने लगता तो मुझे उसकी आहट सुनायी देती. वह सरसरा कर उतर रहा है, बहुत आहिस्ते, जैसे सांप अपनी केंचुल उतारता है. केंचुल उतंरने के बाद लगता शरीर बहुत हल्का हो गया है और आने वाले बुखारों को झेलने में समर्थ है. बुखार के बाद त्वचा में एक अजीब पतलापन आ जाता था और हाथ की शिराओं का नीला रंग उभर आता जिसे देर तक देखना अच्छा लगता.
मंगलेश जी हिन्दी साहित्य के बहुत सम्मानित हस्ताक्षर हैं। कविता तो उनकी विधा है। उन्होंने समाज को प्रगतिशील नजरिये से देखने की चेतना पर भी बहुत काम किया है। जनसंघर्षों का साथ तो दिया ही मजदूर, किसान, शोषित, दमित, महिला और दलित संदर्भों को भी हर मंच से उठाया। डबराल जी का जन्म टिहरी गढ़वाल के काफलपानी गांव में हुआ था। देहरादून में पढ़ाई के बाद में दिल्ली आ गये। यहीं ‘हिन्दी पेटियट’, ‘प्रतिपक्ष’ और ‘आसपास’ में काम किया। बाद में भोपाल के सांस्कृतिक केन्द्र भारत भवन से निकलने वाली पत्रिका ‘पूर्वग्रह’ में सहायक संपादक के रूप में काम करने लगे। इलाहाबाद और लखनऊ से प्रकाशित ‘अमृत प्रभात’ में साहित्य संपादक रहे। 1983 में दिल्ली आकर ‘जनसत्ता’ के साहित्य संपादक के रूप में कार्य करने लगे। कुछ समय ‘नेशनल बुक ट्रस्ट’ में रहे। ‘सहारा समय’ के साहित्य संपादक रहे। बीच में कुछ और पत्र-पत्रिकाओं के साथ भी जुड़े। उनकी साहित्यिक यात्रा बहुत लंबी है। उनके चार कविता संग्रह पहाड़ पर लालटेन (1981), घर का रास्ता (1988), हम जो देखते हैं (1995), आवाज भी एक जगह है (2000), कवि का अकेलापन, नये युग में शत्रु’ में प्रकाशित हुये हैं। एक यात्रा डायरी ‘एक बार आयोवा’ (1996) और एक गद्य संग्रह लेखक की रोटी (1997) में प्रकाशित हुई है। उनकी कविताओं का भारतीय भाषाओं के अलावा अंग्रेजी, रूसी, जर्मन, फ्रांसीसी, स्पानी, पोल्स्की, बोल्गारी आदि भाषाओं में अनुवाद हुआ है। उन्होंने कई विदेशी कवियों की कविताओं का अनुवाद किया है। उन्हें अपने कविता संग्रह ‘पहाड़ पर लालटेन’ के लिये साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिला। मुझे उनकी बहुत सारी कविताएं पसंद हैं। दो कविताएं आपके साथ साझा कर रहा हूं-
1.
पहाड़ पर चढ़ते हुए
तुम्हारी सांस फूल जाती है
आवाज भर्राने लगती है
तुम्हारा कद भी घिसने लगता है
पहाड़ तब भी है, जब तुम नहीं हो।
2.
अत्याचारी के निर्दोष होने के कई प्रमाण हैं
उसके नाखून या दांत लंबे नहीं होते हैं
आंखें लाल नहीं रहती
बल्कि वह मुस्कराता रहता है
अक्सर अपने घर आमंत्रित करता है
और हमारी ओर अपना कोमल हाथ बढ़ाता है
उसे घोर आश्चर्य है कि लोग उससे डरते हैं।
अत्याचारी के घर पुरानी तलवारें और बंदूकें
सिर्फ सजावट के लिए रखी हुई हैं
उसका तहखाना एक प्यारी सी जगह है
जहां श्रेष्ठ कलाकृतियों के आसपास तैरते
उम्दा संगीत के बीच
जो सुरक्षा महसूस होती है वह बाहर कहीं नहीं है
अत्याचारी इन दिनों खूब लोकप्रिय है
कई मरे हुए लोग भी उसके घर आते-जाते हैं।
-चारु तिवारी