राजीव लोचन साह
विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के शब्दों में ‘मदर ऑफ डेमोक्रेसी’ अब पूरी तरह एक प्रहसन में बदल गया है। बल्कि इसे प्रहसन कहना भी जान जोखिम में डालने जैसा खतरनाक हो गया है। जब एक विदेशी पत्रकार को दिये गये एक पाॅडकास्ट इण्टरव्यू में प्रधानमंत्री आलोचना का सम्मान करने की बात करते हैं, बताते हैं कि हमारे शास्त्रों में ‘निन्दक नियरे राखिये’ कहा गया है, उसी के चन्द दिनों बाद मुम्बई में स्टैण्ड अप कामेडियन कुणाल कामरा के एक प्रहसन पर आसमान फट कर जमीन पर गिर पड़ता है। मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों पर पैरोडी के माध्यम से व्यंग्य करने पर कुणाल के खिलाफ न सिर्फ पुलिस में प्राथमिकी दर्ज हो जाती है, बल्कि उन्हें जान से मार देने की धमकी दी जाती है और उस स्टूडियो, जहाँ उनकी पैरोडी रिकाॅर्ड की गई थी, में जबर्दस्त तोड़फोड़ की जाती है। स्पष्ट है कि मीडिया को चेतावनी दे दी गई है कि कार्टून या व्यंग रचनायें प्रकाशित करने से परहेज करे। इधर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का इस तरह कबाड़ा किया गया है तो उधर हाईकोर्ट के जजों ने न्यायपालिका का कबाड़ा करने का बीड़ा उठा लिया है। पिछले दिनों इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक जज का निर्णय आया कि किसी महिला के स्तन पकड़ने, उसका नाड़ा तोड़ देने या उसे पुलिया के नीचे खींच ले जाने को बलात्कार का प्रयास नहीं माना जा सकता। देश के समझदार नागरिक इस निर्णय पर अपने बाल नोंचने में लगे ही थे कि दिल्ली हाईकोर्ट के एक जज के आवास से करोड़ों रुपये मिलने की खबर आ गई। दरअसल, जज साहब घर पर नहीं थे और उनके आवास में आग लग गई। अग्निशमन वालों को बुलाया गया तो वे एक कमरे में अधजले नोटों की गड्डियों का पहाड़ देख कर हैरान रह गये। इस घटना से उस न्यायपालिका के सामने बहुत बड़ा प्रश्नचिन्ह लग गया है, जिस पर करोड़ों देशवासियों की आस्था टिकी है कि अगर उन पर अन्याय या अत्याचार होगा तो न्यायपालिका उन्हें बचा लेगी।