जगमोहन रौतेला
दूध की थैली को प्लास्टिक की थैली में ले जाने वाले , सब्जी लेने बिना झोले के बाजार जाने वाले , टमाटर – धनिया- लहसुन को भी अलग – अलग पौलिथीन में रखवाने वाले , कुरकुरे और पान मसाला खाकर उसके खाली पाउच बीच सड़क में फेंक देने वाले , सफर में चलते वक्त घर से पीने का पानी लेकर न चलने वाले , रास्ते में बोतल बंद पानी खरीदकर और आधा ही पीकर शान के साथ बस में छोड़ देने या फिर गाड़ी की खिड़की से जोर से बाहर फेंक देने वाले , धार्मिक जलसों के दौरान प्लास्टिक के गिलास में पानी पीने – पिलाने व थर्माकोल की थाली में प्रसाद (भोजन) परोसकर देने और उसमें खाकर पुण्य प्रताप प्राप्त करने वाले , हर तरह की बैठक में भी बोतल बंद पानी पीने वाले…
नदियों के किनारे शवदाह करते समय उसमें बेवजह ( फटाफट घर जाने के लिए शव को जल्दी फूकने के लिए ) डीजल , मिट्टी तेल , गाड़ियों के टायर डालकर जलाने वाले , अपने घर व दुकान का कूड़ा नालियों में फेंकने वाले , सड़कों पर चलते हुए बेबात जोर – जोर से हार्न बजाने वाले , गाड़ – गधेरों – गंगा- यमुना जैसी नदियों को कूड़े से पाट देने वाले , रातों रात लखपति – करोड़पति बनने के लिए नदियों का सीना खनन के माध्यम से छलनी कर देने वाले , सड़क चौड़ी करने के लिए सौ – सौ साल पुराने फलदार – छायादार पेड़ों की हत्या कर देने वाले , पेड़ों की इन हत्याओं पर शर्मनाक चुप्पी साध लेने वाले , अपने घर में एक इंच जमीन भी कच्ची न रहने देने और उसके ऊपर महंगे मारबल ,टाइल्स लगाकर जमीन का दम घोंट देने वाले , मोहल्ले में पड़ोसी के घर जाने के लिए भी दोपहिया का प्रयोग करने वाले , गर्मी में एसी चलाकर कम्बल ओढ़कर सोने वाले , घड़े का ठंडा पानी पीना पिछड़ा होने की निशानी मानने वाले…
मोहल्ले के खाली प्लॉट को कूड़ेघर में बदल देने वाले , राते के अँधेरे में या फिर चलती गाड़ी से छलछलाती नहर में कूड़ा फेंकने वाले , जैव विविधता से परिपूर्ण जंगलों को कूड़े का डम्पिंग जोन बना देने वाले , शादी – ब्याह व अन्य दूसरे शुभ अवसरों पर डीजे में कानफोड़ू संगीत बजाकर कर बेशर्मी से कमर मटकाते हुए पड़ोसियों की नींद हराम कर देने वाले , धार्मिक समारोहों में रात – रात भर जोर – जोर से लाउडस्पीकर बजाने और ऐसा न करने का विनम्र अनुरोध करने वाले बुजुर्ग पड़ोसियों को लात- घूँसे मारने में बिल्कुल भी न हिचकने वाले , दोस्तों के साथ कार में दारु पीकर बोतल को सड़क में फेंक देने वाले , लालबत्ती होने पर भी दो – दिन मिनट तक अपनी गाड़ियों को स्टार्ट रखने वाले , सड़क में जगह न होने पर भी जोर – जोर से हार्न बजाकर रास्ता मॉगने वाले …
अपने घर में एक पेड़ न लगाने वाले , फुलवारी के नाम पर बिना गंध वाले प्लास्टिकनुमा फूल लगाकर इठलाने वाले , सार्जनिक सड़कों – नालियों में कब्जा कर के गुर्राने वाले , कागज को बर्बाद करने वाले , किसी भी तरह के चुनाव में कागज के पर्चे – पोस्टरों- बिल्लों को सड़क में बिखेर कर उसके ऊपर डान्स करने वाले , अपने प्यारे- प्यारे डॉगियों को सवेरे- सवेरे मोहल्ले की गलियों में घूमाते हुए उसको अपने डॉगी की पौटी से महकदार बना देने वाले , थर्माकौल पर प्रतिबंध के बाद भी अपने स्कूल के बच्चों से उसी पर प्रोजेक्ट बनाकर लाने को कहने वाले स्कूल वाले इन दिनों सबसे ज्यादा मुखर हैं ” हिमालय बचाने ” को लेकर ।
हिमालय को नहीं,खुद को बचाओ । हिमालय कोई मिट्टी, चट्टानों व पत्थरों का विशाल आकृतिनुमा ढेर नहीं है । हिमालय बनता है , नदियों , पेड़- पौधों , जैव विविधताओं , विभिन्न तरह के पशु – पक्षियों , कीट – पतंगों , जड़ी- बूटियों के विशाल संसार , ग्लेशियरों से । जिसे हम किसी न किसी बहाने लूट – खसोट व बर्बाद करने में लगे हुए हैं । ऐसे में खतरा हिमालय को नहीं,हमारी मुर्खताओं से मनुष्य व दूसरे जीव-जन्तुओं पर है।