भुवन पंत
सनातन संस्कृति में आये दिन जितने पर्व और त्योहार होते हैं, शायद ही किसी संस्कृति में इतने त्योहार मनाए जाते हों। इन त्योहारों को मनाने के पीछे कई गंभीर संदेश छुपे हैं। हमारे कुछ पर्व और त्योहार सौर मास (सूर्य के संक्रमण) तथा कुछ चान्द्रमास (चन्द्रमा के संक्रमण) पर आधारित हैं। सौर मास के अनुसार कर्क संक्रान्ति पर हरेला , सिंह संक्रान्ति पर ओगिया, मकर संक्रान्ति पर उतरैणी, मीन संक्रान्ति पर फूलदई तथा मेष संक्रान्ति पर बिखौती का त्योहार मनाया जाता है, जब कि रक्षाबन्धन, दशहरा, दीपावली, होली, बसन्तपंचमी आदि का निर्धारण चान्द्रमास की तिथि के अनुरूप मनाये जाते हैं। हरेला कुमाऊॅ के लोगों का एक प्रमुख सौरमासी पर्व है और इसी दिन से सूर्य दक्षिणायन हो जाता है। जिसमें उत्तरायण अथवा उतरैणी तक शुभकार्य वर्जित माने गये हैं। हालांकि विवाह आदि मार्गशीर्ष में होते हैं, लेकिन यज्ञोपवीत व गृहप्रवेश जैसे शुभकार्य दक्षिणायन में वर्जित है।
हरेला का त्योहार श्रावण सौरमास के पहले दिन होता है,जो प्रायः हर साल 16 जुलाई को होता है, जब कि उतरैणी प्रायः 14 जनवरी को होती है। यद्यपि सौरमास के दिन आंग्ल कैलैण्डर की तरह प्रत्येक माह के निश्चित नहीं होते, इनमें कोई माह कभी 29 दिन का भी होता है, तो कभी 32 दिन का भी। फिर भी यह विचित्र संयोग है कि जिस वार को हरेला होता है, उसके बाद आने वाली मकर संक्रान्ति भी उसी वार को होती है। मसलन इस बार हरेला शनिवार को है, तो आने वाली मकर संक्रान्ति भी शनिवार को ही होगी ।
हरेला कुमाऊॅ का एक प्रमुख लोकपर्व है और इसी तरह का एक लोकपर्व उत्तर भारत में तीज के नाम से भी लगभग इसी दरम्यान मनाया जाता है। तीज मनाने के पीछे कहानी है कि जब सती ने अगले जन्म में हिमालय पुत्री पार्वती के रूप में घोर तपस्या कर भगवान शिव को पुनः प्राप्त किया तो श्रावणशुक्ल पक्ष की तृतीया को पार्वती का शिव के साथ विवाह सम्पन्न हुआ। इसी खुशी में तीज पर्व मनाया जाता है। हालांकि हरेले की तरह हरियाली तीज भी होती है, लेकिन तीज व हरेले को मनाने के तौर-तरीके भिन्न है, जब कि पौराणिक आख्यान का आधार लगभग समान है। हरेला त्योहार भी शिव-पार्वती के विवाह के उल्लास के रूप में मनाया जाता है, इसीलिए कुमाऊं के कुछ हिस्सों में हरेले के अवसर पर मिट्टी की मूर्त्तियों से शिव-पार्वती परिवार के प्रतीक बनाये जाते हैं, जिन्हें डिकारे कहा जाता है।
हरेले त्योहार से पूर्व लोग घरों में टोकरियों, मालू के पत्तों से बने पुड़ों अथवा घर के अन्य किसी पात्र में हरेला बोते हैं। हरेला बोने के लिए पांच नाज अथवा सात नाज (पांच अथवा सात अनाजों) को बोया जाता है। घर ही के आस-पास खेत से साफ-सुथरी जगह की मिट्टी लाकर, उसे सूखाकर छाना जाता है। फिर दो पात्रों में मिट्टी भरकर उसके ऊपर हरेले का बीच छिड़ककर ऊपर से छानी गयी मिट्टी की एक पतली तह बिछा दी जाती है तथा उसमें पानी छिड़ककर जमने के लिए छोड़ दिया जाता है । हरेले बोये गये बर्तन को किसी अंधेरे स्थान पर रखा जाता है, ताकि हरेले के पत्तों का रंग पीला हो । आवश्यकतानुसार हर दूसरे-तीसरे दिन हरेले में पानी दिया जाता है । हरेले के त्योहार के पहले दिन सायं में दो मुॅहे ’ ताव ’ से हरेले की गोड़ाई की जाती है । हरेले त्योहार के दिन नित्यकर्म पूजा के बाद हरेले की गृहस्वामी द्वारा धूप,दीप एवं नैवेद्य से पूजा-प्रतिष्ठा कर हरेला काटा जाता है । सर्वप्रथम हरेले के तिनड़े देवताओं को अर्पित कर घर के बुजुर्ग ’’जी रयै, जागि रयै, दुब जस पनपिये, स्याव जसि बुद्धि है जो, स्यों जस तराण हैजो, सिल पिसी भात खये, बुकिल जस फुलि जये ’’ ( जीते रहना, जागृत रहना , दूब की तरह पनपना, सियार की जैसी बुद्धि हो, शेर की जैसी ताकत हो , इतनी लम्बी उम्र जीना कि दांत गिरने पर भात को सिल पर पीस कर खाना पड़े और सिर के बाल बुकिल के पौधे के समान सफेद हो जाएं ) जैसी आशीष के साथ घर के सभी सदस्यों के सिर पर रखते हैं। दूर देहातों में घर के द्वार पर भी हरेले के तिनड़े रोपने की परम्परा है।
कुमाऊॅ में यों तो वर्ष में तीन बार हरेला बोया जाता है । चैत्र नवरात्रि, शारदीय नवरात्रि व कर्क संक्रान्ति पर। चैत्र नवरात्रि व शारदीय नवरात्रि में हरेला बोने का मुख्य कारण, जैसा मैं समझ पाया कि नवरात्रि लेने वाला देवी उपासक अपने घर पर घट स्थापना कर उसकी प्राण-प्रतिष्ठा करता है। घट का तला समतल न होने से लुढ़कने से रोकने लिए उसके नीचे मिट्टी रखी गयी होगी। घट की जब जौ अथवा धान्य से प्रतिष्ठा की गयी तो नीचे गिरे धान्य मिट्टी में अंकुरित होकर जम गये। नौ दिन के अन्तराल में वे पौधों के रूप में विकसित होकर हरेला बन गए और देवी माँ के प्रसाद स्वरूप उसे मान्यता दी गयी । नौंवे दिन नवरात्र के पारायण के साथ, उन्हें देवी मॉ को अर्पित किया जाता है और दशमी को त्योहार के साथ हरेला सिर पर रखा जाता है। हालांकि अब घट स्थापना न होने की स्थिति में भी नवरात्रि का हरेला परम्परा का हिस्सा बन गया। इस हरेले में सप्तधान्य को होना जैसा विधान भी नहीं है। नवरात्रि के हरेले में दिन निश्चित हैं, पहली नवरात्रि को हरेला बोया जायेगा, बीच की तिथि पूरी हों, बढ़ी हो अथवा कोई तिथि क्षय हो, नवमी को देवी माँ को अर्पित कर दशमी को हरेला निश्चित रूप से काटा जायेगा। यहां दिनों की गिनती नहीं बल्कि तिथियों के हिसाब से हरेले काटने का विधान है।
लेकिन श्रावण मास की संक्रान्ति को काटा जाने वाला हरेला अपनी-अपनी कुल परम्परा के अनुसार 9 दिन, 10 दिन अथवा 11 दिन का होता है यानि संक्रान्ति से उतने दिन पूर्व बोया जाता है। क्योंकि यह एक स्थान विशेष का लोकपर्व है, जिसे मनाने का कोई पौराणिक उल्लेख कहीं नहीं मिलता। हो सकता है, उच्च हिमालयी क्षेत्रों में तापमान की कमी के कारण हरेला उगने में अधिक वक्त लगता हो, इसलिए उन्होंने 11 दिन का हरेला बोना शुरू किया जब कि गरम क्षेत्र के लोगों ने 9 अथवा 10 दिन का। एक अन्य कारण ये भी हो सकता है कि किसी कुल अथवा परिवार में किसी जातक अशौच अथवा मृत्यु अशौच के कारण दिन आगे-पीछे करने पड़े हों और बाद में यह उस कुल की परम्परा बन गई। अधिकांशतः 10 दिनों के हरेले की परम्परा आम है।
सनातन धर्म में जितने भी पर्व एवं त्योहार मनाये जाते हैं, उनके पीछे कोई न कोई वैज्ञानिक सोच अथवा तर्क निहित है। विशेषरूप से हमारा पर्वतीय समाज तो सदैव ही प्रकृति का पुजारी रहा है। तुलसी पूजा, वट पूजा, पीपल पूजा, आमलकी एकादशी पूजा, पीपलपानी पर पीपल का वृक्ष रोपित करने की परम्पर, ये परम्परा कहीं न कहीं पर्यावरण चेतना का संदेश देती हैं।
सावन का महीना हरियाली से सराबोर महीना है और बरसात का मौसम होने के कारण कोई भी पौधा रोपित करने पर जड़ पकड़ लेता है। बड़े- बुजुर्ग गांवों में अब भी हरेले के त्योहार को पौधारोपण का उपयुक्त समय मानते हैं तथा कई फलदार पौधों की कटिंग हरेले पर्व के अवसर पर रोपित की जाती हैं। इसका एक वैज्ञानिक पक्ष यह भी है, कि यह त्योहार किसानों के लिए मृदा व बीज परीक्षण का एक प्रयोगात्मक माध्यम है। अपने खेत की मिट्टी लाकर और उसमें पांच या सात प्रकार के अन्न बोकर यह देखना कि मिट्टी कौन से अन्न उपजाने के लिए उपयुक्त है, यह उस अन्न की पौध की वृद्धि स्वयं बता देगी। दूसरी ओर किसान द्वारा भण्डारण किये गये बीजों के परीक्षण का भी यह नायाब तरीका हो सकता है। कुल मिलाकर देखा जाय तो हरेला एक कृषि व पर्यावरण संरक्षण का लोकपर्व है, जिसे आज भी गांव से शहर तथा महानगरों में गए लोग भी कुल परम्परा के रूप में अपनाए हुए हैं।
हरेला मनाने के पीछे कारण कुछ भी रहा हो, हरेला हमारी समृद्ध परम्परा का प्रतीक है। इस पर्व को मनाने के साथ इस दिन यदि कुछ पौधारोपण भी करें तो सही अर्थों में यह लोकपर्व की सार्थक हो पाएगा।