देवेश जोशी
उचाणा को मेरो मैर,
कनो पड़े गंगाळ!
बग्द-बग्द मैर गए देवप्रयाग बेड़,
हेरी हेरी दिदा ऐग्यूं रीति घर!
हे शोभनू धुनार, मेरा मैर छलैइ दे!
निरभागी मैर यो गंगाळ पड़ीगे।
नौ मण साट्यों कू उधारो गड़्यूं च,
छ्वटी-छ्वटी नौन्यूं कु कुटणू कू धर्यूं च।
हे शोभनू धुनार, मेरा मैर छलैइ दे!
जेठी समदीण तैं यखी बुलौण
कणसी समदीण तैं पैतो भेजौण!
बुड्या समदी मेरो भूखो चलीगे,
निरभागी मैर यो गंगाळ पड़ीगे।
यूं कुखड़्योन् वो कनो बौळाए,
यू लगे ऊं भेंटण ऊंन चोंच मारीक खौळाए।
बैख की जात कनी करे उत्पात
कु जाणी गुस्सा मा क्या करलो बात
हे शोभनू धुनार, मेरा मैर छलैइ दे!
प्रख्यात साहित्यकार और संस्कृति-मर्मज्ञ गोविन्द चातक जी ने इस गीत को व्यंग्य-गीत के रूप में अपने संग्रह में शामिल किया है। वास्तविकता ये है कि ये गीत इससे काफी बढ़ कर है। महज एक मुर्गे की कहानी नहीं है, ये गीत। निश्चित ही ये लोकगीत महिलाओं द्वारा रचा गया है। अधिकतर लोकगीत जहाँ सरल-सहज होते हैं वहीं इस गीत में व्यंजना जैसा उत्कृष्ट काव्यतत्व भी है। सशक्त व्यंग्य तो द्रष्टव्य है ही। साथ ही ये इस बात का भी द्योतक है कि शिक्षा और सूचना के सीमित संसाधनों के बावजूद तत्कालीन समाज में महिलाओं की मेधा पुरुषों से कमतर नहीं थी। आइए, देखते हैं ये गीत कितना-कुुछ अभिव्यक्त करता है, शब्दों में, संकेतों में और व्यंजना में।
गीत तीन पदों में है। पहले पद में सीधी-सपाट अभिधा में नायिका बताती है कि उसकी मनौती का मुुर्गा नदी में बह गया है। बहते-बहते वो देवप्रयाग के नीचे पहँुच गया है। उसे ढूँढते हुए मैं खाली हाथ वापस घर आ गयी हूँ। हे! शोभनू धुनार(नदी पार कराने वाला) मेरे मुुर्गे को नदी से निकाल कर ले आ। मेरा अभागा मुर्गा देखो, नदी में बह गया है।
दूसरे पद में परिवार की गरीबी और अभाव का पता चलता है। नौ मन धान परिवार ने पहले ही उधार ले रखा है। कूटने का काम परिवार की छोटी-छोटी बेटियां कर रही हैं। जाहिर है परिवार भी बड़ा है और बड़ी बेटियों के हिस्से में कुछ बड़े और कठिन काम हैं। बावजूद इसके रस्मो-रिवाज़ को बदस्तूर निभाया जा रहा है। परिवार में पूजा का आयोजन हो रहा है, जिसमें शामिल होने के लिए बड़ी समधिन आने वाली है, छोटी समधिन को उसके गाँव ही उसका हिस्सा भिजवाना है। समस्या ये है कि आयोजन का मुख्य आकर्षण मनौती का मुर्गा तो भाग कर नदी में कूद गया है। बूढ़ा समधी जो बड़े उत्साह से आया था, मुर्गा-विहीन दावत खाने का बिल्कुल इच्छुक नहीं है और नाराज़ होकर भूखा ही चले गया है। ऐसे में शोभनू धुनार पर ही उम्मीद टिकी है और उससे कहा जा रहा है कि हे! शोभनू धुनार मेरे मुुर्गे को नदी से निकाल कर ले आ। मेरा अभागा मुर्गा देखो, नदी में बह गया है।
तीसरे पद में न सिर्फ़ क्लाइमेक्स में राज़ का पर्दाफ़ाश होता है बल्कि व्यंजना में मन की बात भी कर दी गयी है। राज ये है कि मुर्गे ने नदी में कूदने का फैसला स्वेच्छा से नहीं किया है बल्कि उसे ऐसा करने के लिए उकसाया गया है, मुर्गियों द्वारा दीवाना बनाया गया है। वो तो मुर्गियों से प्रेमवश आलिंगन मात्र कर रहा था पर उन निर्दयी मुर्गियों ने इसे चोंच मार-मार कर निराश कर दिया है। बेचारा मुर्गा इस उपेक्षा को दिल पे ले बैठा और नदी में कूद पड़ा। आखिर है तो मर्दजात ही। कैसा उत्पात कर दिया है। मर्दों का गुस्सा भी कौन नहीं जानता है, पता नहीं क्या कर जाएं। अब तो शोभनू धुनार ही कुछ कर सकता है। हे! शोभनू धुनार मेरे मुुर्गे को नदी से निकाल कर ले आ। मेरा अभागा मुर्गा देखो, नदी में बह गया है।
व्यंजना में तीसरे पद का सम्बंध पुरुष जाति से ही है। पुरुष भले ही रसिक-मिज़ाज हो पर तत्कालीन समाज (जब बहुपत्नी प्रथा भी चलन में थी) में महिलाओं के द्वारा पुरुष (भले ही पति ही क्यों न हो) के इस व्यवहार पर आपत्ति करना दुस्साहस और अशिष्टता ही माना जाता था। चतुर पहाड़ी महिला ने पुरुषों की इस दुष्प्रवृŸिा की ओर ध्यानाकर्षित करने के लिए मौका चूकना नहीं चाहती। मुर्गे की आड़ में पुरुष को ही सुनाया जा रहा है कि बेचारे को उन महिलाओं ने कैसे खाली हाथ लौटा दिया है जिनपे वो डोरे डाल रहा था। यहाँ तक कह दिया कि ये तो उनसे लिपटना ही चाहता था पर उन्होंने ही इसे दुत्कार कर भगा दिया। मर्दजात है, ठीक पूजा-आयोजन के समय इसने कैसी समस्या खड़ी कर दी है। अब प्रतिष्ठा का सवाल बना दिया है। न जाने क्रोध में क्या कर बैठे। लोगों ने नदी की तरफ जाते हुए देखा है। कहीं नदी में कूद ही न गया हो। हे! शोभनू धुनार मेरे मुुर्गे (पति) को ढूँढ कर ले आ। कहीं अभागा नदी में बह ही न गया हो।
20वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध तक गढ़वाल क्षेत्र में महिलाओं के लिए शिक्षा और चिकित्सा के बहुत कम अवसर थे। महिलाओं से जुड़ी बहुत सारी कुप्रथाएँ भी प्रचलित थी। ये यहाँ की महिलाओं की जिजीविषा और प्रबल इच्छाशक्ति ही रही है कि तमाम विपरीत परिस्थितियों से उबर कर उन्होंने न सिर्फ़ स्वयं को सशक्त किया है बल्कि पूरी दुनिया के लिए अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत कर राह भी दिखायी है।
लोकगीतों में महिलाओं की वेदना के साथ आकांक्षाओं को भी अभिव्यक्ति मिली है। पुरुषों से भी वो एकपत्नीव्रत की अपेक्षा रखती हैं। सीधे नहीं कह पायी तो गीत का सहारा लिया। लोकगीत इसीलिए मात्र मनोरंजन के लिए नहीं रचे गए, उनमें दमित भावनाओं और अतृप्त अपेक्षाओं को भी रास्ता मिला है। गढ़वाली में ही एक लोकोक्ति है – बोल बेटी, सुणों ब्वारि। इस लोकोक्ति को चरितार्थ होता हुआ भी देखा जा सकता है लोकगीत, मैर में। जहाँ सुनायी तो मुर्गे के भागने से उपजी व्यथा जा रही है पर पुरुषों की बेवफाई से लगी महिला-मन को ठेस भी साफ सुनी जा सकती है।