राजीव लोचन साह
जी-20 सम्मेलन को सम्पन्न हुए अभी दो महीने भी नहीं बीते हैं। इस सम्मेलन के बाद कहा जा रहा था कि भारत अब विश्वगुरु बन गया है। मगर अब एकाएक भारत की विदेश नीति में बहुत बड़े छिद्र दिखलाई देने लगे हैं। ऐसा लग रहा है मानो देश की बागडोर दूरदर्शी राजनेताओं और अनुभवी अधिकारियों के हाथ में न होकर नौसिखुओं के हाथ में चली गई है। दो-तीन उदाहरण पर्याप्त होंगे। 7 अक्टूबर को इजराइल पर हमास के हमले के बाद इजराइल ने फिलीस्तीन पर सीधा हमला कर दिया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने तत्काल इजराईल के साथ अपनी एकजुटता जाहिर कर दी। इससे भारत की विदेश नीति को जानने वाले लोग सकते में आ गये क्योंकि अब तक न सिर्फ कांग्रेस (या यू.पी.ए.) की सरकारें बल्कि अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एन.डी.ए. सरकार भी फिलीस्तीन के साथ खड़ी रहती आयी थीं। कुछ ही दिनों बाद विदेश सचिव अरिंदम बागची का वक्तव्य आ गया कि भारत की विदेश नीति अभी भी फिलीस्तीन के साथ रहने की है। यही नहीं, प्रारम्भिक गलती ठीक करते हुए भारत द्वारा गाज़ा में रहने वाले फिलीस्तीनियों के लिये भारी मात्रा में राहत सामग्री भी भेजी गई। लेकिन 27 अक्टूबर को भारत का रुख फिर से बदल गया जब उसने संयुक्त राष्ट्र संघ में एक प्रस्ताव, जिसमें तत्काल युद्ध रोकने की माँग थी और जो अन्ततः भारी बहुमत से पारित हुआ, पर अपने आप को वोटिंग से अलग रखा। लोग पशोपेश में हैं कि भारत आज कहाँ खड़ा है और क्या वह सचमुच युद्ध को जारी रखना चाहता है। उधर 26 अक्टूबर को कतर की एक अदालत ने आठ सेवानिवृत्त नौसेनिकों को मृत्युदण्ड दे दिया है। ये लोग साल भर से भी अधिक समय से कतर की जेल में थे और भारत सरकार इनको छुडवाने के लिये कोई प्रभावी कोशिश नहीं कर पायी। लोग हैरान हैं कि कतर जैसा देश जिसके साथ भारत का जबर्दस्त व्यापार है और जहाँ लाखों भारतीयों को रोजगार मिला है, कैसे भारत का शत्रु बन गया। हमारी विदेश नीति पर यह दुःखद टिप्पणी है।