अरविंद शेखर
कुछ आंकड़े देखिए
वर्ष 2011 की जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक देश में 49 करोड़ 49 लाख लोग भूमिहीन हैं। 1951 में देश में दो करोड़ 73 लाख भूमिहीन खेत मजदूर थे। 2011 में यह बढ़कर 14.4 करोड़ हो गए हैं। 2011 के सामाजिक आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक ग्रामीण क्षेत्र में 56.41 प्रतिशत परिवार भूमिहीन थे यानी 10 करोड़ 10 लाख परिवार। इनमें से अधिकांश अनपढ़ दलित व ओबीसी के लोग हैं। ये वो लोग हैं जो शायद ही खुद को देश का नागरिक साबित कर पाएं।
देश में 14.2 फीसद यानी करीब 20 करोड़ मुसलमान है। 2011 की जनगणना के मुताबिक देश के 22 फीसद भूभाग में 10 करोड़ 40 लाख यानी देश की कुल आबादी के करीब नौ फीसद आदिवासी रहते हैं।इन आदिवासियों में से अधिकांश के पास शायद ही कोई दस्तावेज हो। खदानों या अन्य परियोजनाओं को कॉरपोरेट को सौंप कर न जाने कितने आदिवासी वनवासी अपनी जमीन से बेदखल कर दिए गए हैं।
देश में हर साल करीब 50-60 करोड़ लोग किसी न किसी प्राकृतिक आपदा की चपेट में आ जाती है।इसमें से न जाने कितनों के दस्तावेज नष्ट हो जाते हैं।
आशंका है कि इनमें से अधिकांश सीएए के बाद लागू होने वाले एनआरसी में अगर नागरिकता साबित नहीं कर पाएंगे। तो क्या इतनी बड़ी आबादी को देश में बनने वाले यातना गृहों में रखा जाएगा। या उन्हें हिटलर के गैस चैंबरों की तरह मार डाला जाएगा।
असम के अनुभवों को देखें तो वहां करीब सवा तीन करोड़ लोगों ने आवेदन कया था, जिसमें पहले 40 लाख लेकिन बाद में एनआरसी की आखिरी सूची में 19,06,657 लोग बाहर हो गए। इनमें से 12 से 14 लाख हिंदू थे। पांच साल चली इस अमानवीय कवायद में 1600 करोड़ रुपये खर्च हुए। 55 हजार कर्मचारी इसमें लगाए गए। खुद को देश का नागरिक साबित करने के लिए आम लोगों को काम-धाम छोड़कर अपने गांव घर आना पड़ा। न जाने कितने दिनों तक मीलों लंबी लाइनों में खड़ा होना पड़ा। बहुत से लोग तो दस्तावेजों में केवल स्पेलिंग न मिलने से एनआरसीसे बाहर हो गए। दस्तावेज तैयार करने के लिए घूस का कारोबार तेजी से चला।
देश की आबादी 125-130 करोड़ मान ली जाए तो तय मानिए डेढ़ से दो लाख खरोड़ रुपये का खर्च आना ही है। सीएए और एनआरसी पहले से बीमार देश की अर्थव्यवस्था के लिए यह ताबूत की अंतिम कील साबित होगा।