डॉ. योगेश धस्माना
होली है, जो न वैरभाव को जगाती है, न जात-पात को देखती है और न ही छोटे-बड़े का भेद समझती है। ऐसा त्योहार भारतीय संस्कृति के अतिरिक्त कहीं नहीं दिखाई देता, जिसमें समाज के लोग आपसी मनमुटाव को भुला कर हारमोनियमों और ढोलकियों की थाप पर नाच गाकर अपने को इन्द्रधनुषीय रंगों में रंगते हैं।
उत्तर प्रदेश के मथुरा-बरसाने की होली के बाद उत्तराखण्ड की होली का विशेष महत्व व स्थान है। इस पर्वतीय क्षेत्र में होली के सामान्यतः दो रूप हैं। बैठकी एवं खड़ी होली।
इकट्ठा होकर घूम फिर के या खड़े होकर गाए जाने वाले गीतों को ’खड़ी होली’ कहा जाता है। बैठकी होली में ब्रज गीतों को शास्त्रीय ढंग से गाया जाता है। उत्तराखण्ड में अल्मोड़ा की होली के बाद गढ़वाल की होली जानी पहचानी जाती है। कुमाऊं में होली की बैठकें पूष की संक्रान्त से शुरू हो जाती है। खड़ी होली शिवरात्री पर्व से शुरू होकर छरड़ी तक चलती है। इतने लम्बे समय तक होली उत्तराखण्ड के अलावा और कहीं नहीं खेली जाती है।
फागुन के आते ही सार (खेत) में फूलों ने अपने अड्डे जमा लिए हैं। जगह-जगह फूल ही फूल खिले होते हैं – आरू हो या चौला, लंया हो या पंया, अथवा चमूलाड़ी फूल की विभिन्न किस्में- इसमें सबसे ऊपर बुरांश अपने दहकते लाल रंग में दिखाई दे रहा है। फागुन अपनी मादक गंध को बिखेरते हुए गजब का उत्साह दिखा रहा है। इसी बीच कहीं से बैठकी होली में दीपचन्दी बहार सुनाई दे रही है।
“मेरी अंखियन डारत गुलाल श्याम रसिया न मारे रे, रंग महल में नौबत बाजे बाजे गोरी की पायलिया।“
राजघरानों से गढ़वाल में होली का जन्म हो चुका था। गढ़वाल की पुरानी राजधानी श्रीनगर एवं टिहरी में होली के हुल्यारों की बात कुछ निराली ही थी। यहां के होली सम्राट नारायण दत्त थपलियाल तो आए दिन टिहरी नरेश प्रद्युम्न शाह (18वीं शताब्दी) और गुमानी के युग की होली गाते रहते थे।
श्रीनगर, टिहरी व पौड़ी, इन तीनों में पौड़ी शहर बहुत बाद में होली के हुल्यारों का अड्डा बना। कहने का तात्पर्य यह है कि इस समय राजा श्रीनगर टिहरी चला गया था। अब पौड़ी और श्रीनगर में दूरी थी ? कुल जमा आठ मील, इसलिए थोड़ा बहुत होली के दखिनों (हुल्यारों) के अड्डे यहां बने रहे ।
सन् 1815 में कुमाऊं के साथ ही गढ़वाल पर अंग्रेजों का अधिकार हो चुका था, इस पहाड़ी क्षेत्र पर अंग्रेजों के कब्जे जमाने से एक काम यह हुआ है कि कुमाऊं गढ़वाल के होलीबाज एक दूसरों से मिलते रहे, इससे बैठक बाजों की संख्या में ही नहीं वरन इसके गुणों में भी वृद्धि हुई। कुमाउनी समाज ने भी जब-तब गढ़वालियों की होली को खूब सराहा।
गढ़वाल में शहर पौड़ी की होली का अपना ही अलग रंग है जिसमें हिन्दू, मुसलमान, ईसाई व अन्य समुदाय के लोग भी अपने को होली के रंग में रंगते आये हैं। एक अनुमान के अनुसार सबसे पहले होली पौड़ी गांव से शुरू हुई, यहां नन्दा सिंह रावत, रणजीत सिंह, त्रिलोक सिंह, मदन सिंह आदि लोगों ने होली खेलने की परम्परा शुरू की।
पौड़ी की होली का प्रसिद्ध स्थल चौधरात में बरसों से होली जलाई जा रही है। अब तो यहां होली का प्रतीक स्तम्भ भी बन गया है। यहां होली के दिन खड़ी होली गाई जाती है। इस इलाके में मुसलमानों की संख्या अधिक है,लेकिन यहां के मुस्लिम भाई बिना किसी झिझक के हिन्दुओं के साथ होली गाते और खेलते हैं। फागुन के महीने में पौड़ी में जिधर कान घुमा लो उधर ही होली की बैठकों की धूम मची रहती है।
“बरजोरी रंग डाले गिरधारी रे,
मोरि, रंग से भिगो दीनि सारी रे।“
एक जमाने की बात है जब पौड़ी में होली के पुराने हुल्यार मदन मोहन लाल शाह के यहां होली की बैठकें इस कदर जमी रहतीं कि उठने का नाम ही नहीं लेती थी। चिरंजीलाल वर्मा भांग घोटते रहते और पान सिंह बिष्ट तो होली के उन हुल्यारों में थे जो अपने सुरीले कंठ से होली गीत गाकर सभी की नींद हर लेते थे। मोहन (मदन लाल शाह), मदन सिंह, तारी लाल शाह, दयासागर धस्माना, अजीत सिंह, नारायण दत्त जी, भूपेन्द्र सिंह, मंगल सिंह एवं मन्ना बाबू पर तो पूरे फागुन के महीने होली का नशा चढ़ा रहता। होली के आगमन से पूर्व ही इनके द्वारा बैठकें शुरू कर दी जाती थीं। वैसे कभी-कभी खुले आंगन में भी होली की बैठकें लगती थीं, इनमें कुछ लोग तो मेहमानों की आदर-खातिर में लगे रहते। मन्ना व तारा की हंसी मजाक में सुबह से शाम हो जाती थी। दूसरी ओर अजीत सिंह, मदनसिंह एवं दया सागर जी अपनी हारमोनियमों व तबलों के रस में डूबे रहते। इन सबके बीच बड़े याकूब, हुसैनी, जब्बार भाई, इकराम अली, ज्ञान विक्टर, मौहम्मद सिद्दीक, यामीन कुरैशी और मुद्दी भाई अपने साथियों के साथ खड़ी होली का इंतजार करते। पौड़ी में खड़ी होली तो बड़े याकूब के नेतृत्व में ही होती जिसमें हिन्दू, मुस्लिम, सिख समुदाय के सभी लोग सड़कों पर गाते नजर आते । स्वर्गीय नारायण दत्त थपलियाल और दया सागर धस्माना ने तो बड़े याकूब की शार्गिदी में ही खड़ी होली को परवान चढ़ाया था। मुस्लिम आबादी के बीच ’चौधरात’ जहां सबसे पुरानी होली जलायी जाती है, उसकी राख का टीका बड़े याकूब अपने हिन्दू हुलैरों को लगाकर खड़ी होली का आगाज करते थे।
गढ़वाल में पहले रूद्रप्रयाग की बदैणें होली की बैठकों में आती रहती थीं। आज उस जमाने के जो व्यक्ति जिंदा हैं वे बदैणों की होली को आज भी शिद्दत से याद करते हैं। लेकिन जब से वातावरण में अश्लीलता व अभद्रता आनी शुरू हुई तब से बदैणों (तवायफ) ने होलियों में आना बन्द कर दिया।
एक समय ऐसा भी था, जब गढ़वाल की होली कुमाऊं अंचल से भी आगे बढ़ गई थी। यहां के इस त्योहार में जो शिष्टता व शालीनता थी वह सर्वत्र प्रसिद्धि पा रही थी। किन्तु इस युग के अवसान के बाद एक वक्त ऐसा भी आया जब पौड़ी शहर की होलियों का रंग धीरे-धीरे बिसरने लगा और पहले जैसा उत्साह लोगों में नजर नहीं आने लगा। कुछ अन्तराल के बाद सन् 1995 से कुछ कोशिशों के बाद अजीत सिंह नेगी, दया सागर धस्माना, राय साहब, वीरेन्द्र कश्यप, गौरी शंकर थपलियाल के साथ नई पीढ़ी के नौजवानों ने होली की बैठकों में फिर से आना शुरु किया तो एक बार फिर पौड़ी की वादियों में होली पुनः पुराने रंग में लौटने लगी। इन बैठको में रंगों के साथ पुरखों की सांझी संस्कृति के स्वर भी गूंजने लगे। इन नये युवाओं में रियाज कुरैशी, अताउल्ला खान, फरीद अहमद, बड़े याकूब के नाती जहीर आलम, खुन्नू भाई, आशुतोष नेगी आदि युवाओं के प्रयासों से पौड़ी का सांस्कृतिक गौरव लौटता हुआ दिखाई देने लगा।
गढ़वाली होली गीत समय की आवश्यकतानुसार लिखे और गाए गए अन्यथा अधिकतर गीत मथुरा, वृंदावन के ही गीत यहां गाए जाते रहे हैं। जहां तक होली में जोश व उत्साह की बात आती है उसमें पौड़ी शहर की होली की अपनी अलग पहचान है। इस सन्दर्भ में कुछ व्यक्तियों में खास तमगे लगे हुए हैं इनमें श्री कृष्ण चन्देल, वीरेन्द्र कश्यप, भगवान वर्मा, कृष्णा रावत का नाट्य अभिनय सदैव याद किया जाता है। इनके बिना तो होली का रंग जमता ही नहीं।
गढ़वाल की होली के साथ ही उन नामों को स्मरण करें- जिनमें सर्वश्री बड़े याकूब, हुसैनी, बौडा (ताऊ), विक्टर बौडा सहित वे तमाम व्यक्ति जिनके नाम विस्मृत हो रहे हैं जिन्होंने कभी पौड़ी में होली की परम्परा को आगे बढ़ाया था। इस बीच पौड़ी के सांस्कृतिक जीवन से हबीब भाई भी चल बसे, उनके चले जाने से शायरी और गायकी का एक यादगार चेहरा भी दुनियां से विदा गया है। इस होली पर उनकी याद का आना भी होली रसिकों को रुला रहा है। गढ़वाल में वसन्त पंचमी से लेकर विषुवत संक्रांति तक चलने वाले थड्या, चौंफला, गीतों में यहां का जनमानस डूबा रहता है। इसी अवधि में होली के गीतों की भी धूम घर-आंगनों में सुनाई देने लगती है। अब तो मोहनरावत, अनिल बिष्ट, मनोज मंजुल और गौरी शंकर के नेतृत्व में भी होरी के हुल्यार बैठकों की तैयारी में जूट रहे हैं। आनन्दी वर्मा और गोपा सजवान भी महिला होली की बैठकों के लिए ठौर तलाशने लगी हैं। पौड़ी के इस फागुनी बयार में सीडी-कैसेटों के माध्यम से नरेन्द्र सिंह नेगी की गढ़वाली होली भी सुनाई दे रही है –
“ऐगे फागुन मैंना खेला होरी कैन रंगी चदरी अर केन रंगीना धोती… ऐगे फागुन मैंना खेला होरी… ।“